बेटा जिंदा जला, फिर भी सारण के शिवरतन तिवारी ने अंग्रेजों से कैसे लिया लोहा, पढ़िए पूरी वीरगाथा
स्व. पंडित शिवरतन तिवारी
Shivratan Tiwari : अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानी पंडित शिवरतन तिवारी के घर में आग लगा दी, जिसमें उनका छोटा बेटा झुलस गया. इसके बावजूद, तिवारी का हौसला पस्त नहीं हुआ और वे आजादी की लड़ाई में डटे रहे. उनकी वीरता की कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है.
Shivratan Tiwari : अंग्रेजी हुकूमत से भारत को आजादी दिलाने के लिए जब देशभर में आंदोलन तेज हो रहा था, उस दौर में सारण के जलालपुर प्रखंड के रणबांकुरे भी अंग्रेजों के खिलाफ मजबूती से खड़े थे. महात्मा गांधी के आह्वान पर मंगोलापुर गांव के दर्जनों युवाओं ने सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक सक्रिय भूमिका निभाई. इन्हीं में पंडित शिवरतन तिवारी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है.
आज भी शिलापट्ट पर दर्ज है स्वतंत्रता सेनानी का नाम
जलालपुर के मंगोलापुर निवासी पंडित शिवरतन तिवारी ने वर्ष 1917 के चंपारण सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई. स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. आज भी प्रखंड कार्यालय परिसर में लगे शिलापट्टों पर उनका नाम देखकर युवा उनके संघर्ष को याद करते हैं.
गांधी के आह्वान पर नीलहा आंदोलन से जुड़े
परिजनों के अनुसार, महात्मा गांधी के नेतृत्व में नीलहा आंदोलन शुरू होने के समय ही शिवरतन तिवारी आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे. मंगोलापुर गांव में गांधीजी के नेतृत्व में नमक बनाने का काम भी शुरू हुआ था. गांव के नोनिया समुदाय से रेह एकत्र कर नमक तैयार किया जाता था. इस काम में शिवरतन तिवारी की सक्रियता काफी बढ़ गई थी.
अंग्रेजों ने घर में लगा दी आग
परिजनों के अनुसार, नमक बनाने और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता की जानकारी अंग्रेजों को हुई तो उन्होंने शिवरतन तिवारी की तलाश शुरू कर दी. काफी प्रयास के बावजूद जब अंग्रेज उन्हें पकड़ नहीं सके तो उनके घर में आग लगा दी गई. उस समय घर के अंदर उनका छोटा बेटा सो रहा था. आग में झुलसने से उसकी मौत हो गई.
बेटे की मौत के बाद भी नहीं टूटा हौसला
परिजनों के मुताबिक, परिवार ने शिवरतन तिवारी को अंग्रेजों से बचाने के लिए घर से दूर रखा था. आग लगने के दौरान अन्य लोग बाहर थे, जबकि उनका मासूम बेटा अंदर रह गया. बेटे की दर्दनाक मौत के बावजूद शिवरतन तिवारी का हौसला नहीं टूटा. वह महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की गतिविधियों में लगातार सक्रिय रहे.
भारत छोड़ो आंदोलन में भी निभाई अहम भूमिका
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ, तब शिवरतन तिवारी भी सक्रिय रहे. परिजनों के अनुसार, अंग्रेजी तंत्र को कमजोर करने के उद्देश्य से उन्होंने जलालपुर बाजार स्थित डाकघर में आग लगा दी थी. इस घटना में अंग्रेजी शासन से जुड़े कई जरूरी कागजात जलकर राख हो गए थे.
सैकड़ों युवाओं के साथ उखाड़ दी थीं रेलवे पटरी
परिजनों के अनुसार, शिवरतन तिवारी अपने सैकड़ों युवा साथियों के साथ कोपा-सम्होता रेलवे स्टेशन भी पहुंचे थे. वहां रेलवे की पटरियां उखाड़ दी गईं, जिससे रेल यातायात प्रभावित हुआ. उस दौर में स्वतंत्रता आंदोलनकारियों की ऐसी गतिविधियों का उद्देश्य अंग्रेजी शासन के कामकाज को बाधित करना था.
20 नवंबर 1943 को गिरफ्तार हुए शिवरतन तिवारी
अंग्रेजी शासन ने आखिरकार शिवरतन तिवारी को गिरफ्तार कर लिया. परिजनों के अनुसार, 20 नवंबर 1943 को अंग्रेजों के खिलाफ गतिविधियों के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर छपरा जेल भेजा गया. जेल में रहने के दौरान भी उनकी सक्रियता बनी रही. इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें छपरा जेल से पटना जेल स्थानांतरित कर दिया.
संघर्ष की कहानी आज भी युवाओं को देती है प्रेरणा
शिवरतन तिवारी का जीवन स्वतंत्रता आंदोलन में स्थानीय लोगों की भूमिका की याद दिलाता है. परिवार के अनुसार, उन्होंने व्यक्तिगत नुकसान और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष जारी रखा. उनके नाम का शिलापट्ट पर दर्ज होना आज भी जलालपुर के लोगों के लिए गौरव का विषय है.
आजादी के इतिहास में स्थानीय सेनानियों की अहम भूमिका
भारत की आजादी का इतिहास केवल बड़े नेताओं और राष्ट्रीय स्तर के आंदोलनों तक सीमित नहीं है. गांव और प्रखंड स्तर पर भी हजारों लोगों ने आंदोलन को मजबूती दी थी. सारण के जलालपुर के शिवरतन तिवारी की कहानी भी इसी स्थानीय संघर्ष और बलिदान की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आती है.
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