शहादत दिवस पर याद किये गये शहीद-ए-आजम भगतसिंह

Edited by ARUN KUMAR
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शहादत दिवस

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पूर्णिया. रविवार को स्थानीय टाउन हॉल में भाकपा-माले की जिला कमेटी की ओर से शहीद-ए-आजम भगतसिंह का शहादत दिवस मनाया गया. कार्यक्रम का संचालन कमेटी सदस्य व अखिल भारतीय किसान महासभा के जिला अध्यक्ष इस्लाम उद्दीन कर रहे थे. कार्यक्रम को भाकपा-माले के जिला सचिव विजय कुमार, जिला स्थायी समिति सदस्य चतुरी पासवान, चन्द्र किशोर शर्मा, ऐपवा जिला सचिव व राज्य कमेटी सदस्य सुलेखा देवी आदि ने संबोधित किया. नेताओं ने कहा कि भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव व राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दिए 94 साल हो चुके हैं. उन्हें तय समय से एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई थी. तब से उन्हें उर्दू में शहीदों के सरताज, ””शहीद-ए-आज़म”” के नाम से जाना जाता है. उर्दू में “इंकलाब जिंदाबाद ” का मशहूर नारा, जिसे भगत सिंह ने अमर कर दिया, आज भी पूरे भारत में बदलाव और न्याय की सामूहिक पुकार के रूप में गूंजता है. भगत सिंह सिर्फ़ जोश से भरे हुए क्रांतिकारी युवा नहीं थे, बल्कि वे औपनिवेशिक भारत के सबसे परिपक्व और दूरदर्शी विचारकों में से एक थे. उनका और उनके साथियों का बलिदान सिर्फ़ औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त होने की जोशीली चाह तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक समाजवादी भारत का सपना लेकर चले थे. भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल विदेशी हुकूमत से आज़ादी की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह एक महान राष्ट्रीय जागरण भी था. इसने गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने और आज़ाद होने के लिए करोड़ों भारतीयों को एकजुट किया, साथ ही आधुनिक भारत की परिकल्पना को भी आकार दिया. इन दोनों ही मायनों में भगत सिंह एक अद्वितीय स्वतंत्रता सेनानी थे.

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