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बेजान मिट्टी में जान फूंक सरस्वती की प्रतिमा बना रही पूर्णिया की बेटी

बेटियां किसी से कम नहीं

विकास वर्मा, पूर्णिया. जब किसी उत्सव विशेष पर जब कहीं मूर्ति निर्माण की बात आती है तो अमूमन इसके निर्माण में पुरुष मूर्तिकार निर्माण में व्यस्त नजर आते हैं. मगर, पूर्णिया इससे कुछ अलग है. यहां की बेटी भी पूजा पिछले एक दशक से न केवल मूर्ति बना रही है बल्कि घर के खर्च में पिता की सहायता भी कर रही है. अभी मौसम के हिसाब से वह देवी सरस्वती की मूर्ति बनाने में व्यस्त है. अब वह मूर्तिकला में पूरी तरह पारंगत हो गई है और इस पर उसके माता-पिता को काफी गर्व भी है.

बेटियां किसी से कम नहीं.

दरअसल, विरासत में मिली इस कला के जरिये पूजा बड़ी ही कुशलता के साथ बेजान मिट्टी में इस कदर जान फूंक देती है कि लोग मूर्ति को देखते ही रह जाते हैं. अपनी इस कला को लेकर पूजा पूरे पूर्णिया में चर्चा का विषय बन गई है. पूजा अभी देवी सरस्वती की प्रतिमा बना रही है पर वह अवसर विशेष पर देवी दुर्गा, काली मां, गणेश भगवान सहित अन्य देवी देवताओं की भी प्रतिमा सहज रुप से बनाती आ रही है. मूर्तिकार रामु की बेटी पूजा अपनी कला सिर्फ पूर्णिया ही नहीं बल्कि भागलपुर, मधेपुरा, पश्चिम बंगाल, अररिया, किशनगंज, कटिहार सहित अन्य जिलों में डंका बजता है. उक्त स्थलों से पूजा की हाथों की बनाई हुई प्रतिमा का डिमांड खूब है.

मूर्ति निर्माण में बहन पुष्पा भी देती है साथपूजा मां सरस्वती की मूर्तियों को फाइनल टच दे रहीं हैं. पूजा के साथ इनकी छोटी बहन पुष्पा भी प्रतिमा बनाने में हाथ बांटती है. पूजा का कहना है कि उनके पिता दशकों से मूर्ति बनाते आ रहे हैं. लिहाजा वे बचपन से पिता को मूर्तियों की कारीगरी करते हुए देखती आ रही थी. उनकी मूर्तियों की डिमांड बाजार में अधिक है. मूर्तियों की नक्काशी से लेकर, मां को पहनाए जाने वाले परिधान सब कुछ भिन्न होते हैं. वे एक दुल्हन की तरह मां सरस्वती को रूप देती हैं. यहां तक कि हाथों में मेहंदी तक लगाई जाती है. पिता की विरासत संभालते हुए अपनी छोटी बहन आरती, पुष्पा व भाई शिवम व सुंदरम को पढ़ाई में आगे बढ़ा रही है. इन होनहार बेटियों की कारीगरी ऐसी कि दुकान की सारी मूर्तियों की एडवांस बुकिंग हो चुकी है.

सिमेंट की मूर्तियां भी बनाती है पूजा

देवी सरस्वती की प्रतिमा बुकिंग करने आये लोगों का कहना हैं कि पूजा के हाथों की बनायी प्रतिमा हु ब हु देवी सरस्वती की तरह दिखती है. पिता रामू के सान्निध्य में वह मिट्टी के साथ वह सिमेंट की मूर्तियां भी सहज रूप से बना लेती है. पूछने पर पूजा बताती है कि वह छह साल की उम्र से ही पिता को अक्सर अकेले मूर्तियां बनाते देखती थी. बाद के दिनों में वह पिता की मदद के बहाने मिट्टी मंथने लगी. फिर धीरे-धीरे वह इस कला में निपुण होती चली गई और आज अपने बल पर अलग-अलग देवी-देवताओं की प्रतिमा बना रही है. इतना ही नहीं महापुरुषों और व्यक्तिगत लोगों की भी तस्वीर देखकर उनकी प्रतिमा बनाती हैं. पूजा की हाथों की बनाई हुई प्रतिमा पहले ही बुकिंग हो जाती है.

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