पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया रद्द होने पर सवालों में पूर्णिया विवि, डेढ़ साल की देरी पर घिरा प्रशासन

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पूर्णिया विश्वविद्यालय

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पूर्णिया विश्वविद्यालय पीएचडी सत्र 2024-25 की प्रवेश प्रक्रिया निरस्त किए जाने के बाद सवालों के घेरे में है. राजभवन के नए निर्देश का हवाला देकर रद्द की गई प्रक्रिया पर छात्र संगठन गंभीर सवाल उठा रहे हैं. अभ्यर्थियों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है.

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पूर्णिया से अभिषेक भास्कर की रिपोर्ट

पूर्णिया : पीएचडी सत्र 2024-25 की प्रवेश प्रक्रिया निरस्त किए जाने के बाद पूर्णिया विश्वविद्यालय एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गया है. विश्वविद्यालय प्रशासन ने राजभवन सचिवालय (लोकभवन) के नए निर्देश का हवाला देते हुए प्रवेश प्रक्रिया रद्द कर दी है. हालांकि सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आवेदन लेने के बाद विश्वविद्यालय ने महीनों तक प्रवेश परीक्षा क्यों नहीं कराई. यदि समय पर परीक्षा आयोजित हो जाती तो बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता.

कुलपति के निर्देश पर जारी की गई तथ्यात्मक जानकारी

कुलपति प्रो. विवेकानंद सिंह के निर्देश पर विश्वविद्यालय के मीडिया पदाधिकारी प्रो. संतोष कुमार सिंह ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पूरे मामले पर विश्वविद्यालय का पक्ष रखा. विज्ञप्ति के अनुसार 2 जुलाई को आयोजित सिंडिकेट बैठक से पहले सामूहिक छात्र संघर्ष समिति ने विभिन्न मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपा था. इसी के जवाब में विश्वविद्यालय प्रशासन ने तथ्यात्मक जानकारी सार्वजनिक की.

विश्वविद्यालय के अनुसार, राजभवन सचिवालय द्वारा जारी नई व्यवस्था के तहत अब पीएचडी प्रवेश परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी. प्रवेश की प्रक्रिया राजभवन द्वारा निर्धारित नए नियमों के अनुरूप पूरी की जाएगी. इसी कारण पीएचडी सत्र 2024-25 की प्रवेश प्रक्रिया निरस्त करनी पड़ी.

दिसंबर 2024 में शुरू हुई थी आवेदन प्रक्रिया

विश्वविद्यालय ने दिसंबर 2024 में तत्कालीन कुलपति प्रो. पवन कुमार झा के कार्यकाल में पीएचडी प्रवेश परीक्षा (पैट-2024) के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे. 23 दिसंबर 2024 से 25 जनवरी 2025 तक ऑनलाइन आवेदन लिए गए थे. उस समय विभिन्न विषयों में कुल 189 सीटें निर्धारित की गई थीं.

समर्थ पोर्टल पर दोबारा लिए गए आवेदन

बाद में कुलपति प्रो. विवेकानंद सिंह की पहल पर समर्थ पोर्टल के माध्यम से आवेदन प्रक्रिया फिर शुरू की गई. विश्वविद्यालय ने दावा किया था कि नई व्यवस्था से विदेशी विद्यार्थियों को भी पीएचडी में नामांकन का अवसर मिलेगा.

393 अभ्यर्थियों ने किया था आवेदन

विश्वविद्यालय के आंकड़ों के अनुसार पैट-2024 के लिए कुल 393 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था. मार्च 2026 में विश्वविद्यालय ने बताया था कि संशोधित व्यवस्था के तहत विभिन्न विषयों में कुल 61 सीटें निर्धारित की गई हैं. इसके बावजूद प्रवेश परीक्षा की तिथि घोषित नहीं की गई और प्रक्रिया लगातार टलती रही.

छात्र संघर्ष समिति ने उठाए गंभीर सवाल

सामूहिक छात्र संघर्ष समिति ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर छात्रों को गुमराह करने का आरोप लगाया है. समिति का कहना है कि आवेदन प्रक्रिया पूरी होने के करीब डेढ़ वर्ष बाद भी प्रवेश परीक्षा आयोजित नहीं कराई गई. अब नए निर्देश का हवाला देकर पूरी प्रक्रिया ही रद्द कर दी गई. समिति ने पूछा है कि परीक्षा में हुई देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई की गई.

समिति का आरोप है कि विश्वविद्यालय ने छात्रों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया है. परीक्षा, शोध, नामांकन, अंकपत्र, शुल्क और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे विषयों पर अब भी स्थिति स्पष्ट नहीं है.

अभ्यर्थियों में बढ़ी चिंता

प्रवेश प्रक्रिया निरस्त होने के बाद पीएचडी में नामांकन की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के सामने असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है. अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने समय पर आवेदन किया, लेकिन विश्वविद्यालय की देरी का खामियाजा अब उन्हें भुगतना पड़ रहा है. अब सभी की नजर राजभवन की नई प्रवेश प्रक्रिया और विश्वविद्यालय की अगली घोषणा पर टिकी है.

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Shruti Kumari

लेखक के बारे में

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श्रुति कुमारी एक पत्रकार और डिजिटल कंटेंट राइटर हैं। उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से अंग्रेजी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया है। वर्तमान में वे प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें विभिन्न प्लाटफॉर्म्स पर डिजिटल पत्रकारिता और कंटेंट राइटिंग का लगभग दो वर्षों का अनुभव है। अपने समाचार पोर्टल पर कार्य करते हुए उन्होंने समाचार लेखन और डिजिटल कंटेंट निर्माण में अनुभव हासिल किया। सामाजिक मुद्दों, महिला सशक्तिकरण, राजनीति, शिक्षा और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लिखना उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है। इसके अलावा वे डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए स्क्रिप्ट राइटिंग करती हैं तथा हिंदी कविता और अंगिका भाषा में लेखन का भी शौक रखती हैं। प्रकृति से उनका विशेष लगाव है और वे मानती हैं कि संवेदनशील, तथ्यपरक और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता समाज में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सकती है।

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