पूर्णिया कला भवन में जीवंत हुई बिहार की लोक विरासत: 25 युवा साधक सीख रहे 'झिझिया' की पारंपरिक बारीकियां

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पूर्णिया में 'झिझिया' लोकनृत्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए एक विशेष कार्यशाला आयोजित हो रही है, जहां 25 युवा कलाकार पारंपरिक कला सीख रहे हैं.

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बिहार की समृद्ध और गौरवशाली लोक संस्कृति की अनमोल धरोहर 'झिझिया' लोकनृत्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और इसके पारंपरिक स्वरूप के संरक्षण-संवर्धन की दिशा में पूर्णिया में एक सराहनीय पहल शुरू हुई है.

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शहर के ऐतिहासिक कला भवन स्थित लोक कला केंद्र के प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन केंद्र की ओर से सात दिवसीय विशेष लोक कला प्रशिक्षण कार्यशाला का विधिवत आयोजन किया जा रहा है. 20 सितंबर से शुरू हुई यह कार्यशाला 26 सितंबर तक चलेगी. कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन वरिष्ठ रंगकर्मियों और कलाविदों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया.

25 युवा कलाकार सीख रहे भाव-भंगिमा, ताल और ऐतिहासिक महत्व

इस सात दिवसीय गहन प्रशिक्षण शिविर में सीमांचल के करीब 25 कला साधक और युवा प्रतिभागी पूरे उत्साह के साथ भाग ले रहे हैं.

कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को झिझिया नृत्य की पारंपरिक शैली, कदमों की थिरकन, ताल, लय और मंचीय भाव-भंगिमाओं की बारीक तकनीकें सिखाई जा रही हैं. नृत्य के शारीरिक अभ्यास के साथ-साथ प्रशिक्षु कलाकारों को झिझिया के पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व से भी विस्तार से रूबरू कराया जा रहा है, ताकि वे नृत्य की मूल आत्मा को आत्मसात कर सकें.

पारंपरिक गायन और अभिनय का संगम, राष्ट्रीय मंचों पर मिलेगी जगह

आयोजकों ने स्पष्ट किया कि इस कार्यशाला का उद्देश्य महज नृत्य सिखाना नहीं, बल्कि लोक परंपरा की शुद्धता को बचाते हुए उसे आधुनिक मंचीय प्रस्तुति के योग्य बनाना है.

प्रतिभागियों को पारंपरिक झिझिया गीतों के गायन और वादन का भी विशेष अभ्यास कराया जा रहा है. प्रशिक्षण पूरा होने के बाद इन 25 कलाकारों का एक सशक्त दल तैयार किया जाएगा, जिन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख सांस्कृतिक मंचों पर प्रस्तुतियां देने का अवसर मिलेगा, जिससे सीमांचल की इस प्राचीन लोक कला को देशव्यापी पहचान दिलाई जा सके.

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पटना और स्थानीय दिग्गज कलाकारों की टीम तराश रही हुनर

बिहार कला पुरस्कार से अलंकृत वरिष्ठ कलाकार विश्वजीत कुमार सिंह के कुशल मार्गदर्शन में क्षेत्र के कई जाने-माने विशेषज्ञ युवा पीढ़ी को तराश रहे हैं.

प्रशिक्षक दल में काजल देवनाथ, दीपप्रिया, रिया डे और राजधानी पटना से आए चर्चित लोक कलाकार उदय कुमार शामिल हैं. ये विशेषज्ञ कलाकारों को झिझिया की शास्त्रीयता, लयबद्ध पदचाप और मटके के संतुलन से जुड़ी अनूठी मंचीय विधाओं का बारीकी से अभ्यास करा रहे हैं.

'बदलते दौर में नई पीढ़ी तक लोक कलाएं पहुंचाना जरूरी': रंगकर्मी

उद्घाटन समारोह में कला भवन नाट्य विभाग के संयोजक विश्वजीत कुमार सिंह, नाट्य निर्देशक कुंदन कुमार सिंह, वरिष्ठ रंगकर्मी मिथिलेश राय, रेणु रंगमंच संस्थान पूर्णिया के सचिव अजीत कुमार सिंह और शिवाजी राम राव समेत बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी और कला प्रेमी उपस्थित रहे.

विश्वजीत कुमार सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि लोक कलाएं समाज की वास्तविक पहचान और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना की नींव होती हैं. आधुनिकता के इस दौर में लुप्तप्राय हो रही पारंपरिक विधाओं को बचाने का सबसे प्रभावी माध्यम युवा पीढ़ी को सीधे जोड़ना है. इसी संकल्प के साथ यह प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि झिझिया की यह समृद्ध परंपरा आने वाली पीढ़ियों के बीच भी पूरी जीवंतता से सांस लेती रहे.

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