पूर्णिया का मनोकामना हनुमान मंदिर, जहां सच्चे मन से मांगी हर मुराद पूरी होने की है मान्यता

पूर्णिया का मनोकामना मंदिर
पूर्णिया का मनोकामना हनुमान मंदिर शहर की आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहाँ सच्चे मन से की गई पूजा से मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता है. प्राकृतिक सुंदरता और अनूठी वास्तुकला इसे खास बनाती है.
पूर्णिया जिला मुख्यालय के आरएन साव चौक और जेल चौक के बीच ग्रीन पार्क से सटा भगवान हनुमान का मनोकामना मंदिर शहर की आस्था का प्रमुख केंद्र है. यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि अपनी अनूठी बनावट और वर्षों पुरानी मान्यता के कारण भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान रखता है. मंगलवार और शनिवार को यहां जिले के साथ-साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं.
मनोकामना पूरी होने की है मान्यता
भक्तों का विश्वास है कि इस मंदिर में सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने और हनुमान जी के समक्ष अपनी मनोकामना रखने पर इच्छाएं पूरी होती हैं. यही वजह है कि यह मंदिर 'मनोकामना हनुमान मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है. शहर की मुख्य सड़क पर स्थित होने के कारण यहां से गुजरने वाले लोग भी रुककर भगवान के दर्शन करना नहीं भूलते.
मंगलवार और शनिवार को लगता है महाभोग
मंदिर में प्रत्येक मंगलवार को खीर और शनिवार को खिचड़ी का महाभोग लगाया जाता है. अन्य दिनों में श्रद्धालु अपनी श्रद्धानुसार प्रसाद अर्पित करते हैं. दोनों विशेष दिनों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतार लग जाती है. भक्त विधिवत पूजा-अर्चना करने के साथ आरती में भी शामिल होते हैं.
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां श्रद्धा और विश्वास के साथ आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता वर्षों से चली आ रही है.
प्राकृतिक सौंदर्य बढ़ाता है आकर्षण
मंदिर ग्रीन पार्क से सटा होने के कारण हरियाली से घिरा हुआ है. आसपास लगे हरे-भरे पेड़-पौधे इसकी सुंदरता को और बढ़ाते हैं. मंदिर की वास्तुकला भी आकर्षण का केंद्र है. इसकी छत और दीवारों का निर्माण इस तरह किया गया है कि दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा मंदिर किसी विशाल वृक्ष का हिस्सा हो. प्राकृतिक सामंजस्य इसकी विशेष पहचान बन गया है.
तीन दशक पुराना है इतिहास
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मनोकामना हनुमान मंदिर का इतिहास करीब तीन दशक पुराना है. शुरुआती दिनों में यहां एक झोंपड़ी में सीमेंट की हनुमान प्रतिमा स्थापित थी, जहां नियमित रूप से पूजा और भजन-कीर्तन होता था. समय के साथ झोंपड़ी जर्जर हो गई और प्रतिमा भी क्षतिग्रस्त हो गई.
इसके बाद शहर के समाजसेवी पंकज नायक ने मंदिर के पुनर्निर्माण का जिम्मा उठाया. उनके प्रयासों से मंदिर को भव्य स्वरूप मिला और आज यह पूर्णिया शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
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लेखक के बारे में
By अखिलेश चंद्रा
अखिलेश चंद्रा प्रिंट माध्यम में 30 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति की खबरों में रुचि रखते हैं.
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