बिहार, बंगाल और नेपाल के मरीजों की लाइफलाइन बना पूर्णिया का यह अस्पताल

GMCH Purnea: 100 KM Radius में सबसे बड़ा भरोसा, हर हफ्ते 7 हजार मरीज पहुंच रहे GMCH पूर्णिया
GMCH Purnea: पूर्णिया से सत्येन्द्र सिन्हा गोपी की रिपोर्ट. सीमांचल क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बात हो और राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल पूर्णिया का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है. करीब 100 किलोमीटर के दायरे में यह अस्पताल आज सबसे अहम मेडिकल सेंटर बन चुका है. बिहार ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल और नेपाल से भी बड़ी संख्या में मरीज यहां इलाज कराने पहुंच रहे हैं. लगातार बढ़ती मरीजों की संख्या इस बात का प्रमाण है कि जीएमसीएच पूर्णिया सीमांचल के लोगों के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है.
हर दिन मरीजों की भारी भीड़, बेड हमेशा फुल
जीएमसीएच पूर्णिया में मरीजों की भीड़ लगातार बढ़ रही है. अस्पताल के इनडोर वार्ड में लगभग सभी बेड हमेशा भरे रहते हैं. वहीं ओपीडी में हर सप्ताह करीब सात हजार मरीजों की जांच और परामर्श किया जा रहा है. डॉक्टरों की टीम सामान्य बीमारी से लेकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं तक का इलाज कर रही है. अस्पताल में कई जटिल ऑपरेशन भी सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं, जिससे मरीजों का भरोसा और मजबूत हुआ है.
जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज तक का सफर
पूर्णिया में वर्ष 1858 में जिला स्तरीय अस्पताल की शुरुआत हुई थी. समय के साथ इसकी जरूरत और महत्व बढ़ता गया. इसके बाद वर्ष 2012 में इसे मेडिकल कॉलेज के रूप में अपग्रेड किया गया. केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर वर्ष 2019 में भवन निर्माण का पहला चरण पूरा हुआ और एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू की गई. आज यहां मेडिकल शिक्षा के साथ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं.
नर्सिंग और पैरामेडिकल संस्थान से मरीजों को फायदा
जीएमसीएच परिसर में नर्सिंग और पैरामेडिकल संस्थान भी संचालित हो रहे हैं. इससे प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता बढ़ी है और मरीजों को बेहतर देखभाल मिल रही है. अस्पताल प्रशासन का दावा है कि आने वाले दिनों में यहां और अत्याधुनिक सुविधाएं जोड़ी जाएंगी.
शहर के बीचोंबीच होने से पहुंचना आसान
जीएमसीएच पूर्णिया की सबसे बड़ी खासियत इसकी लोकेशन भी है. अस्पताल शहर के बीचोंबीच स्थित है, जिससे यहां पहुंचना आसान है. रोड कनेक्टिविटी और कम्युनिकेशन बेहतर होने के कारण दूर-दराज के मरीज भी आसानी से यहां इलाज के लिए पहुंच जाते हैं.
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By Pratyush Prashant
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