बिहार में PT शिक्षक बेच रहे झालमुड़ी, बोले- BPEd और STET पास करने के बाद भी कम वेतन

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PT Teacher विडिओ स्टोरी

बिहार में सरकारी स्कूल के शारीरिक शिक्षक B.P.Ed और STET पास होने के बावजूद मात्र 16 हजार रुपये मासिक मानदेय में परिवार पालने को मजबूर हैं. आर्थिक तंगी के कारण उन्हें खाली समय में सड़क किनारे झालमूड़ी बेचनी पड़ती है. यह कहानी कम वेतन और सरकारी नौकरी के बावजूद चल रहे उनके संघर्ष को दर्शाती है.

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सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी, B.P.Ed की डिग्री, STET पास और खेलों में वर्षों का अनुभव. इसके बावजूद महीने के महज 16 हजार रुपये के मानदेय में परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है. यही वजह है कि बिहार के शारीरिक शिक्षक-सह-स्वास्थ्य अनुदेशक खाली समय में सड़क किनारे झालमूड़ी बेचकर घर का खर्च चलाने को मजबूर हैं. उनकी कहानी सिर्फ कम वेतन की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है, जहां सरकारी शिक्षक होने के बावजूद रोजी-रोटी के लिए अतिरिक्त काम करना पड़ रहा है.

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"स्कूल में पढ़ाने के बाद झालमूड़ी बेचते हैं, अच्छा नहीं लगता"

उमर बादशाह बताते हैं कि वह सरकारी स्कूल में शारीरिक शिक्षक-सह-स्वास्थ्य अनुदेशक हैं. स्कूल में बच्चों को खेल और शारीरिक शिक्षा से जोड़ने के बाद वह झालमूड़ी बेचने का काम करते हैं.

उन्होंने कहा कि दुकान लगाकर सामान बेचते हुए उन्हें खुद भी अच्छा नहीं लगता, लेकिन परिवार चलाने के लिए यह करना पड़ रहा है. उनका कहना है कि नौकरी के साथ ऐसा काम करना मजबूरी है, क्योंकि मौजूदा महंगाई में 16 हजार रुपये की आय से घर चलाना बेहद मुश्किल हो गया है.

₹8 हजार से शुरू हुई नौकरी, तीन साल बाद ₹16 हजार हुआ मानदेय

उमर बादशाह के मुताबिक शारीरिक शिक्षक-सह-स्वास्थ्य अनुदेशक के तौर पर उनकी बहाली करीब आठ हजार रुपये में हुई थी. लंबे संघर्ष के बाद तीन साल बाद मानदेय बढ़ाकर 16 हजार रुपये किया गया.

उन्होंने बताया कि उनकी शैक्षणिक योग्यता भी कम नहीं है. मैट्रिक और इंटर के बाद ग्रेजुएशन किया, फिर दो साल का B.P.Ed कोर्स किया और STET भी पास किया. इसके बाद नियोजन इकाई के माध्यम से सरकारी स्कूल में नियुक्ति हुई.

"इतनी पढ़ाई के बाद भी कम वेतन में गुजारा मुश्किल"

उमर का कहना है कि शारीरिक शिक्षक और स्वास्थ्य अनुदेशकों ने B.P.Ed, M.P.Ed और कई ने NIS कोचिंग जैसी खेल संबंधी योग्यताएं हासिल की हैं. इसके बावजूद उन्हें दूसरे शिक्षकों की तुलना में काफी कम भुगतान किया जा रहा है.

उन्होंने सरकार से मांग की कि शारीरिक शिक्षक-सह-स्वास्थ्य अनुदेशकों को पूर्णकालिक शिक्षक का दर्जा देते हुए वेतन में बढ़ोतरी की जाए, ताकि उन्हें अतिरिक्त काम करने की मजबूरी न रहे.

पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी भी सिर पर

उमर ने बताया कि उनके पिता सेना में थे और करीब दो-तीन साल पहले उनका निधन हो गया. इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी काफी हद तक उनके ऊपर आ गयी.

ऐसे में 16 हजार रुपये की नौकरी से घर का खर्च, रोजमर्रा की जरूरतें और अन्य जिम्मेदारियां पूरी करना उनके लिए मुश्किल हो गया. इसी वजह से स्कूल की ड्यूटी के बाद वह झालमूड़ी बेचने का काम करते हैं.

"पहले झिझक हुई, फिर लगा मेहनत करने में शर्म कैसी"

स्कूल में पढ़ाने के बाद दुकान लगाने को लेकर शुरुआत में उमर को काफी झिझक महसूस होती थी. उन्होंने बताया कि जिन बच्चों को वह स्कूल में पढ़ाते हैं, उन्हीं के सामने सड़क किनारे झालमूड़ी बेचने में शुरुआत में संकोच होता था.

लेकिन बाद में उन्होंने इसे मेहनत का काम मानकर स्वीकार कर लिया. उनका कहना है कि वह खेल से जुड़े व्यक्ति हैं, इसलिए शारीरिक मेहनत वाले काम करने में उन्हें परेशानी नहीं होती. वह कहते हैं कि मेहनत से कमाया गया पैसा गलत नहीं है, लेकिन अगर सरकार पर्याप्त वेतन दे तो ऐसी मजबूरी नहीं रहेगी.

झालमूड़ी बेचकर रोज करीब 400 रुपये की अतिरिक्त कमाई

उमर के अनुसार झालमूड़ी समेत अन्य सामान बेचकर उन्हें रोज करीब 400 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई हो जाती है. इसी अतिरिक्त आमदनी से वह किसी तरह परिवार की जरूरतें पूरी कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि शिक्षक का भुगतान भी उन्हें नियमित रूप से नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में अतिरिक्त काम से मिलने वाली छोटी-सी आमदनी भी उनके लिए काफी मायने रखती है.

निशांत कुमार भी बोले- सरकार बढ़ाए वेतन

मध्य विद्यालय डंडा के शारीरिक शिक्षक-सह-स्वास्थ्य अनुदेशक निशांत कुमार ने भी कम वेतन की समस्या उठायी. उनका कहना है कि खेल से जुड़े शिक्षक योग्य हैं और उन्होंने वर्षों तक खेल के क्षेत्र में योगदान दिया है.

निशांत के मुताबिक उन्होंने जिला स्तर और इंटर यूनिवर्सिटी स्तर पर खेलों में हिस्सा लिया है. इसके बावजूद शारीरिक शिक्षक-सह-स्वास्थ्य अनुदेशकों को कम भुगतान किया जा रहा है.

"सरकार से हमारी मांग है, सम्मानजनक वेतन मिले"

शारीरिक शिक्षक-सह-स्वास्थ्य अनुदेशकों का कहना है कि वे बच्चों को खेल, स्वास्थ्य और शारीरिक गतिविधियों से जोड़ने का काम कर रहे हैं. ऐसे में उन्हें भी सम्मानजनक वेतन और पूर्णकालिक शिक्षक के रूप में उचित सुविधाएं मिलनी चाहिए.

इन शिक्षकों की कहानी बताती है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले कई कर्मियों के लिए नौकरी मिलने के बाद भी आर्थिक संघर्ष खत्म नहीं हुआ है. अब उनकी नजर सरकार की ओर है कि क्या उनके मानदेय और सेवा शर्तों में बदलाव को लेकर कोई ठोस फैसला लिया जाता है.


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