बिहार के लोगों की शराबबंदी को लेकर क्या है राय, सर्वे में आए चौंकाने वाले नतीजे

बिहार में शराबबंदी को लेकर किए गए सर्वे में आम लोगों ने माना कि शराबबंदी कानून को बेहतर ढंग से लागू करने में पुलिस की निष्क्रियता जिम्मेदार है. 62 फीसदी लोग मानते हैं कि पुलिस और एक्टिव होती तो क्रियान्वयन बेहतर होता. इसमें कई खामियां हैं.
पटना. बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद इससे आम लोगों की सामाजिक, आर्थिक और आजीविका पर पड़े प्रभाव के आकलन को लेकर कराये गये सर्वे में 80 फीसदी लोगों ने माना है कि शराबबंदी कानून बेहतर है और इसे अधिक मजबूती से जारी रखने की जरूरत है. मात्र 13.8 प्रतिशत लोग कानून के खिलाफ रहे. जाति और वर्ग से परे, लगभग सभी महिलाओं ने शराबबंदी कानून का समर्थन करते हुए कहा है कि वह नहीं चाहती कि इसे कभी भी रद्द किया जाये. सोमवार को मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग के आयुक्त बी कार्तिकेय धनजी और चाणक्या लॉ विवि के सामाजिक विज्ञान संकाय (पंचायती राज चेयर) के डीन एसपी सिंह ने शराबबंदी के असर से संबंधित सर्वे रिपोर्ट जारी की.
सर्वे के मुताबिक सर्वे में आम लोगों ने माना कि शराबबंदी कानून को बेहतर ढंग से लागू करने में पुलिस की निष्क्रियता जिम्मेदार है. 62 फीसदी लोग मानते हैं कि पुलिस और एक्टिव होती तो क्रियान्वयन बेहतर होता. इसमें कई खामियां हैं. लोगों ने यह भी कहा कि अवैध शराब के उत्पादन और वितरण में शामिल लोगों को अक्सर छोड़ दिया जाता है जबकि छोटे अपराधी यानि पीने वाले, स्थानीय आपूर्ति कर्ता और होम डिलिवरी करने वाले ही पकड़ कर जेल भेजे जाते हैं.
सीएनएलयू के डीन एसपी सिंह ने कहा कि सर्वे में पता लगा है कि शराब कारोबार से जुड़े लोगों के लिए शराबबंदी से रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. इनमें से अधिकांश आवश्यक सरकारी सहायता के अभाव में उपयुक्त आजीविका विकल्प खोजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हालांकि 67 फीसदी लोगों ने बिहार सरकार द्वारा नीरा को बढ़ावा देने के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह उन लोगों की आजीविका बढ़ाने में मदद करेगा जो परंपरागत रूप से शराब के कारोबार से जुड़े थे.
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मद्य निषेध उत्पाद एवं निबंधन विभाग के आयुक्त बी कार्तिकेय धनजी ने कहा की वर्तमान अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शराबबंदी ने सभी स्तरों (व्यक्ति, परिवार और समाज) पर सकारात्मक बदलाव लाया है. यह महिलाओं और बच्चों की बेहतर स्थिति, लिंग सशक्तीकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक वातावरण जैसे विभिन्न मापदंडों के माध्यम से दिखायी देते हैं.
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