महिला मतदाता ही सौंपेंगी सत्ता की चाबी

राजनीतिक परिदृश्य में अगर हाल के वर्षों में कोई सबसे निर्णायक परिवर्तन आया है, तो वह है महिला मतदाताओं का उभार.
शशिभूषण कुंवर,पटना
राजनीतिक परिदृश्य में अगर हाल के वर्षों में कोई सबसे निर्णायक परिवर्तन आया है, तो वह है महिला मतदाताओं का उभार. अब आरक्षण, जाति समीकरण और धार्मिक ध्रुवीकरण के पार जाकर एक नया वोट बैंक आकार ले रहा है वह है महिला वोट बैंक. यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चेतना है, जो बिहार जैसे राज्यों में सत्ता की दिशा तय कर रही है. बिहार की राजनीति लंबे समय तक जातीय समीकरणों पर टिकी रही है। ‘माई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण से लेकर ‘नरेंद्र मोदी फैक्टर’ तक, रणनीति पुरुष प्रधान मतदाताओं को केंद्र में रखकर बनती थी. पर अब सियासी लकीरें बदल रही हैं. महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और जागरूकता ने राजनीतिक दलों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने के लिए अब सशक्त नारी को साधना होगा.
मतदाता सूची में लिंगानुपात का बढ़ना सिर्फ जनसांख्यिकीय ट्रेंड नहीं है, यह राजनीतिक चेतना की भी पहचान है. जहां 2024 में प्रति हजार पुरुषों पर महिला मतदाता 910 थीं, वहीं 2025 में यह आंकड़ा 914 हो गया. 2015 से लेकर 2024 तक हर चुनाव में महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोटिंग की है. पिछले चार विधानसभा और लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी ने भी सभी राजनीतिक दलों को चौंकाया है. विधासभा चुनाव 2015 के चुनावी आंकड़े बता रहे हैं कि उस समय कुल 56.88 % मतदान हुआ था, जिसमें महिला मतदाताओं ने 60.48 % भागीदारी की थी ,जबकि पुरुषों की मतदान में भागीदारी 53.32 % थी. इसी प्रकार विधानसभा चुनाव 2020 में कुल 57.27 % मतदान हुआ था, उसमें महिला मतदाताओं ने 56.69%वोटिंग की .
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