बिहार से हर साल सात हजार बच्चे होते हैं लापता

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बिहार से हर साल सात हजार बच्चे होते हैं लापता

डीजीपी विनय कुमार ने कहा है कि मानव तस्करी देश में मादक पदार्थों के बाद दूसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है और इसकी रोकथाम में पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है.

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संवाददाता, पटना डीजीपी विनय कुमार ने कहा है कि मानव तस्करी देश में मादक पदार्थों के बाद दूसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है और इसकी रोकथाम में पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है.उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारियों को इन मामलों में पूरी संवेदनशीलता और तत्परता से कार्रवाई करनी चाहिए.डीजीपी बुधवार को पुलिस मुख्यालय में आयोजित विश्व मानव तस्करी विरोधी दिवस के मौके पर राज्य स्तरीय कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे.कार्यशाला का विषय मानव तस्करी और ट्रांसजेंडर से जुड़े मुद्दों पर प्रभावी कार्रवाई था. मौके पर एडीजी (कमजोर वर्ग) अमित कुमार जैन और एडीजी (सीआइडी) पारसनाथ भी उपस्थित थे. डीजीपी ने कहा कि 2018-19 के आंकड़ों के अनुसार, बिहार से प्रति वर्ष लगभग सात हजार बच्चे लापता होते हैं, जिनमें से चार पांच हजार बच्चों को बरामद कर लिया जाता है,पर दो से तीन हजार बच्चों का कोई सुराग नहीं मिलता. डीजीपी ने बताया कि राज्य के सभी जिलों में 2013 से एंटी ट्रैफिकिंग यूनिट (एटीयू ) कार्यरत है. हाल के वर्षों में 150 से अधिक मानव तस्करों को गिरफ्तार किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में सफेदपोश और प्रभावशाली लोग भी तस्करी के नेटवर्क से जुड़े होते हैं, जिन पर सख्त कार्रवाई की जा रही है.कार्यशाला में समस्तीपुर की रतना, जहानाबाद के अमृत कुमार और गया के सत्येंद्र कुमार ने मानव तस्करी के चंगुल से निकलने की अपनी मार्मिक कहानियां साझा कीं. उल्लेखनीय कार्य करने वाले पुलिस अधिकारी सम्मानित : मानव तस्करी रोकने में सराहनीय योगदान देने वाले अधिकारियों को भी सम्मानित किया गया.इनमें रेल एसपी अमृतेंशु शेखर ठाकुर,सारण एसपी डॉ कुमार आशीष, पटना सिटी एसपी भानु प्रताप सिंह व रोहतास एसपी रौशन कुमार हैं.

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