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दूसरी लहर में कोरोना की मारक क्षमता कमजोर, मृत्यु दर पहले से कम, मौसमी दशा और फूड हैबिट बचा रही बिहार की जान

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
कोरोना(सांकेतिक फोटो)
कोरोना(सांकेतिक फोटो)
फाइल फोटो

राजदेव पांडेय,पटना: बिहार में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर बेशक डरावनी है, लेकिन पहली लहर 2020 की तुलना में दूसरी लहर 2021 में कोरोना की मारक क्षमता बेहद कमजोर है. कोविड संक्रमण की पहली लहर में बिहार की औसत मृत्यु दर 0.56 रही थी. अभी की मृत्यु दर इससे काफी कम है. उदाहरण के लिए 15 अप्रैल को कुल संक्रमितों की संख्या 6133 रही. मृतकों की संख्या 24 दर्ज की गयी. मृत्यु दर केवल 0.39 फीसदी रही. 14 अप्रैल को कोविड संक्रमित की संख्या 4786 थी. इसी दिन मृतकों की संख्या 21 रही. इस तरह मृत्यु दर 0.43 फीसदी रही.

उससे पहले 13 अप्रैल को 4157 संक्रमितों की तुलना में 14 की मौत हुई थी. मृत्यु दर 0.33 रही. चिकित्सा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 8 अप्रैल को प्रदेश में कोरोना के मरीजों की मृत्यु दर 0.20 फीसदी, 9 अप्रैल को 0.13, 10 अप्रैल 0.17, 11 अप्रैल को 0.15, 12 अप्रैल को 0.29 , 13 अप्रैल को 0.33 फीसदी रही थी. इससे पहले एक अप्रैल से सात अप्रैल तक मृत्यु दर नाम मात्र की रही.

अधिक गर्मी बरसात और अधिक सर्दी किसी भी तरह के जीवाणुओं और वायरस को कमजोर बना देते हैं या उनकी मारक क्षमता को कमजोर कर देते हैं.अगर देश के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो बिहार की मृत्यु दर अभी उससे एक तिहाई ही है. पहली लहर में पूरे देश में कोरोना संक्रमितों की मृत्यु दर 1.5 फीसदी रही थी. उल्लेखनीय है कि पूरे बिहार में अब तक कोरोना संक्रमितों की संख्या लगभग तीन लाख के करीब पहुंचने जा रही है, जबकि मृतकों की संख्या 1651 रही है.

मृत्यु दर कम होने के पीछे की वजह के बारे में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के प्रो डॉ नंद किशोर शाह का अध्ययन बताता है कि बिहार की मौसमी दशा इसमें सहायक है. उनके अध्ययन में निकल कर आया है कि अधिक गर्मी ,बरसात और अधिक सर्दी किसी भी तरह के जीवाणुओं और वायरस को कमजोर बना देते हैं या उनकी मारक क्षमता को कमजोर कर देते हैं.

निश्चित तौर पर बिहार में कोविड संक्रमण दर ज्यादा बढ़ी हुई है. हालांकि, कोविड की पहली लहर की तुलना में इस दूसरी लहर में मृत्यु दर अपेक्षाकृत काफी कम है. मृत्यु दर कम होने की वजह के पीछे बिहार की विशेष मौसमी दशा और फूड हैबिट जवाबदेह है. यहां के लोग अभी भी देशी अनाज एवं अन्य खाद्य पदार्थों पर ज्यादा भरोसा करते हैं. वे अपनी परंपरागत खाद्य आदत बनाये हुए हैं. इस वजह से इम्यून सिस्टम मजबूत साबित हो रहा है. लोगों को चाहिए कि अपना परंपरागत भोजन पर कायम रहें.

डॉ नंद किशोर शाह, (लाइफ विज्ञानी ) एवं प्रति कुलपति वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा

Posted By: Thakur Shaktilochan

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