Falak Khan Exclusive: फिल्मों में बिहार का मतलब सिर्फ कट्टा-अपराध दिखाना गलत, फलक बोलीं- पर्दे पर अब मॉडर्न तस्वीर जरूरी..
Published by : हिमांशु देव Updated At : 09 Jun 2026 12:28 AM
Falak Khan Exclusive: ऑस्कर के सेमी-फाइनल तक पहुंची फिल्म चंपारण मटन फेम अभिनेत्री फलक खान बिहार की सिनेमाई छवि पर बेबाकी से बात की. उन्होंने कहा कि फिल्मों में बिहार का मतलब सिर्फ कट्टा और अपराध दिखाना अब बंद होना चाहिए. उन्होंने अपने इंजीनियरिंग से एक्टिंग तक के सफर, नेपोटिज्म व नए कलाकारों के लिए टैक्टिकल करियर टिप्स भी साझा किए.
Falak Khan Exclusive: अब फिल्मों में बिहार की पुरानी रूढ़िवादी छवि को बदलने का समय आ गया है. अमूमन फिल्मों में बिहार का मतलब सिर्फ कट्टा, अपराध, कच्ची सड़कें या मवेशी ही दिखा दिया जाता है. अपराध हर राज्य में है, लेकिन बिहार को लेकर एक अलग ही परस्पेक्टिव बना दिया गया है. यह बातें चंपारण मटन जैसी ऑस्कर की दहलीज तक पहुंचने वाली फिल्म से अपनी खास पहचान बनाने वाली अभिनेत्री फलक खान ने कही. वह मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं.
उन्होंने कहा कि आज का बिहार बदल चुका है, यहां काफी डेवलपमेंट हुआ है. ऐसे में इंडस्ट्री में सक्रिय बिहार के ही दिग्गज फिल्ममेकर्स और क्रिएटिव लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे सिनेमा के जरिए यहां के मॉडर्न और एडवांस्ड रूप को दुनिया के सामने लाएं. जब तक समाज के इस बदलते आईने को पर्दे पर नहीं उतारा जाएगा, तब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी.
Q. आपने मुजफ्फरपुर एमआइटी से इंजीनियरिंग और फिर मुंबई से एमबीए किया. पढ़ाई-लिखाई को प्राथमिकता देने वाले परिवार से आने के बाद आपने एक्टिंग जैसा अनिश्चित रास्ता क्यों चुना?
– मेरी पूरी फैमिली एजुकेशनल बैकग्राउंड से है. मम्मी-पापा दोनों बिहार यूनिवर्सिटी में डीन रहे हैं, इसलिए घर में पढ़ाई पहली प्राथमिकता थी. लेकिन एक्टिंग मेरा बचपन का पैशन था. स्कूल-कॉलेज के ड्रामे और थिएटर्स में मैं हमेशा एक्टिव रहती थी. मैंने कॉरपोरेट में कभी जॉब नहीं की. बल्कि एक रणनीति के तहत मैंने मुंबई से एमबीए करना चुना, ताकि मेरी हायर एजुकेशन भी पूरी हो जाए और मुझे सपनों के शहर मुंबई में एक्टिंग के मौके भी मिल सकें. घर वालों को मनाना और बिना किसी गॉडफादर के वहां शुरुआत करना एक बड़ा स्ट्रगल था, जिसे मैंने अपनी मेहनत से पार किया.
Q. शॉर्ट फिल्म चंपारण मटन में आपने एक ग्रामीण महिला सुनीता का किरदार निभाया, जबकि आप खुद मॉडर्न बैकग्राउंड से हैं. इसके लिए आपने खुद को कैसे ढाला?
– यह सही है कि मैं बिहार से हूं, लेकिन हम लोग कभी गांव में रहे नहीं हैं. इसलिए गांव के लोगों का रहन-सहन, उनका उठना-बैठना, खाना-पीना और वहां की खास बोली को पकड़ना मेरे लिए एक बड़ी चुनौती थी. इसके लिए हम लोगों ने एफटीआइआइ (पुणे) में मेरे को-एक्टर चंदन के साथ काफी कड़े वर्कशॉप्स किए. बारीकियों पर काम करने का ही नतीजा था कि यह फिल्म ऑस्कर के सेमी-फाइनलिस्ट तक पहुंची, जो पूरे देश के लिए गर्व की बात थी.
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Q. टीवी शो ‘एक शहर होने को है’ में आपके नेगेटिव किरदार की काफी सराहना हो रही है. पॉजिटिव रोल्स करने के बाद इस चुनौती को कैसे निभाया?
– मैं हमेशा अपनी फिल्मोग्राफी को अलग और चैलेंजिंग रखना चाहती हूं. जब मुझे इस बड़े बैनर और चैनल के शो में नेगेटिव लीड का ऑफर हुआ, तो शुरुआत में मैं थोड़ी संशयी थी कि मैं इसे निभा पाऊंगी या नहीं, क्योंकि विलेन के किरदार के लिए एक बिल्कुल अलग तरह के एक्टिंग टोन की जरूरत होती है. मैंने इसके लिए वर्कशॉप्स कीं और कुछ बेहतरीन फिल्मों से इंस्पिरेशनली. आज फैंस निगेटिव किरदार होने के बावजूद मुझे इतना प्यार दे रहे हैं और मेरे सीन्स का इंतजार करते हैं, यह बतौर एक्टर मेरे लिए बहुत बड़ी संतुष्टि है.
Q. फिल्म इंडस्ट्री में नेपोटिज्म और आखिरी वक्त पर रिप्लेस किए जाने की घटनाएं आम हैं. एक आउटसाइडर के तौर पर आप इसे कैसे देखती हैं?
– देखिए, नेपोटिज्म सिर्फ सिनेमा में नहीं, हर बिजनेस और इंडस्ट्री में है और यह रहेगा भी. कोई भी इंसान अपनी फैमिली के सदस्य को पहला या दूसरा मौका देकर प्रमोट करना चाहेगा, इसमें कुछ गलत भी नहीं है. लेकिन यह तब गलत हो जाता है जब किसी नॉन-टैलेंटेड व्यक्ति को बार-बार मौके देकर किसी ज्यादा डिजर्विंग और टैलेंटेड कलाकार का हक या कला दबाने की कोशिश की जाती है. आउटसाइडर्स के लिए संघर्ष बड़ा है, लेकिन क्राफ्ट मजबूत हो तो रास्ते बनते हैं.
Q. बिहार के छोटे शहरों से जो नए कलाकार मुंबई आने का सपना देखते हैं, उनके लिए आपकी क्या सलाह है?
– आज का जमाना बदल चुका है. मेरा सुझाव है कि आप सीधे मुंबई आकर भीड़ में खोने और आर्थिक बोझ उठाने के बजाय, पहले अपने ही शहर में रहकर खुद को ट्रेन करें. इंटरनेट पर ऑनलाइन कोर्सेज और ट्रेनिंग की काफी सुविधाएं हैं. ऑडिशन पोर्टल्स पर खुद को रजिस्टर करें और जब काम शॉर्टलिस्ट हो जाए, तभी मुंबई मूव करने का टैक्टिकल फैसला लें. मैं खुद मुजफ्फरपुर और पटना में समय-समय पर वर्कशॉप्स करने की प्लानिंग कर रही हूं, ताकि जो मैंने सीखा है वो अपनी माटी के बच्चों को पास-ऑन कर सकूं और उनका स्ट्रगल थोड़ा कम हो सके.
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By हिमांशु देव
सितंबर 2023 से पटना में प्रभात खबर से जुड़कर प्रिंट और डिजिटल के लिए काम कर रहे हैं. कला, साहित्य-संस्कृति, नगर निगम और स्मार्ट सिटी से जुड़ी खबरों पर प्रमुखता से काम किया है. महिला, युवा और जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाना प्राथमिकता में शामिल है. व्यक्तिगत तौर पर किताबें पढ़ना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना अच्छा लगता है.
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