बिहार : HC ने की तीखी टिप्पणी, कहा, कुछ भी कीजिए, लेकिन शिक्षा को बख्श दीजिए, पीढ़ी के लिए कुछ नहीं बचेगा
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :21 Mar 2018 7:57 AM (IST)
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पटना : राज्य में शिक्षकों को मध्याह्न भोजन की जिम्मेदारी थोपने पर पटना हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है. कोर्ट ने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को 30 मार्च तक एक कार्य प्रणाली विकसित करने का आदेश दिया है. अदालत ने कहा कि सूबे के शिक्षकों को मध्याह्न भोजन सहित अन्य गैर शैक्षणिक कार्यों से […]
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पटना : राज्य में शिक्षकों को मध्याह्न भोजन की जिम्मेदारी थोपने पर पटना हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है. कोर्ट ने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को 30 मार्च तक एक कार्य प्रणाली विकसित करने का आदेश दिया है. अदालत ने कहा कि सूबे के शिक्षकों को मध्याह्न भोजन सहित अन्य गैर शैक्षणिक कार्यों से मुक्त रखा जाये. न्यायाधीश डॉ अनिल कुमार उपाध्याय की एकलपीठ ने बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उक्त बातें कही.
अदालत को याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि प्राथमिक स्कूलों में मध्याह्न भोजन हेतु प्रति छात्र औसतन 3.37 रुपये प्रतिदिन मिलता है जिसमें चावल छोड़ भोजन व ईंधन की सभी सामग्री का इंतजाम करना होता है जो अव्यवहारिक है. यही कारण है कि इसमें भ्रष्टाचार व्याप्त है. उनका कहना था कि मध्याह्न भोजन मुहैया कराने वाली समिति छात्रों की संख्या को काफी ज्यादा दिखाकर मिड डे मील की सरकारी निधि का भी दुरुपयोग होता है.
वहीं राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता आशुतोष रंजन पांडे तथा प्रशांत प्रताप ने कोर्ट को बताया कि मिड डे मील को चलाने में शिक्षकों की भूमिका छात्रों की उपस्थिति लेने व मध्याह्न भोजन की राशि का चेक निर्गत करने तक होती है. इस पर अदालत का कहना था कि शिक्षकों को इन जिम्मेदारी से मुक्त क्यों नहीं रखा जाता, ताकि वे पूरा समय शैक्षणिक कार्यों में लगाए रखें. परियोजना को चलाने में स्कूली शिक्षकों को कभी ठेकेदार तो कभी बावर्ची बनना पड़ता है. ऐसे में वे भावी पीढ़ी को क्या पढ़ाएंगे?
हाईकोर्ट ने आईजीआईएमएस पटना के कैंसर विभाग के हेड डॉ राजीव रंजन प्रसाद को 110 दिनों के भीतर संस्थान में योगदान करने का निर्देश दिया है.
साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि अगर डॉ राजीव तय समय सीमा के अंदर संस्थान में योगदान नही करते हैं तो उन्हें एक करोड़ रुपया आईजीआईएमएस को देना होगा. अदालत ने इस बीच इनके बर्खास्तगी आदेश पर रोक लगाते हुए अस्पताल से जवाब तलब किया है. न्यायाधीश मोहित कुमार शाह की एकल पीठ ने डॉ राजीव रंजन प्रसाद की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया.
अदालत को बताया गया कि डॉ राजीव को इस संस्थान में 11 अगस्त 1998 को कैंसर सेंटर के हेड के पद पर तैनात किया गया था. इस संस्थान में काम करने के दौरान वे यूनाइटेड नेशन के ऑस्ट्रिया के विएना में स्थित इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी में तीन साल के लिए रेडीएशन ओंकोलोजिस्ट पद पर बहाल हुए. उन्होंने इसकी जानकारी अस्पताल को देते हुए छुट्टी देने की गुहार लगाई. अस्पताल प्रशासन ने उन्हें तीन साल के बजाय एक साल की छुट्टी दे दी. एक साल पूरा होने के पहले एक बार फिर उन्हें दो साल की छुट्टी दी गई.
उनके काम को देखते हुए आईएईए ने दो साल का सेवा विस्तार कर दिया. इसके बाद डॉक्टर ने अपनी छुट्टी बढ़ाने के लिए फिर एक आवेदन संस्थान को दिया. अस्पताल के गवर्निंग बॉडी ने इनके छुट्टी के आवेदन को खारिज कर तीन माह के भीतर संस्थान में योगदान करने का आदेश दिया लेकिन डॉक्टर राजीव ने अस्पताल में ज्वाइन नहीं किया. इसके बाद अस्पताल प्रशासन ने उन्हें तीस दिनों के भीतर अस्पताल ज्वाइन करने का आदेश देते हुए कहा कि संस्थान द्वारा निर्धारित तिथि तक अगर वे योगदान नही करते हैं तो वे अपने को संस्थान की नौकरी से बर्खास्त समझे.
संस्थान के आदेश की वैधता को हाई कोर्ट में डॉ राजीव ने चुनौती दी है. अदालत ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि आइजीआइएमएस में कैंसर विभाग सरकार की ड्रीम प्रोजेक्ट में से एक प्रोजेक्ट है. विभाग के हेड के पद पर कार्यरत होने के बावजूद वे अपनी सेवा यहां की जनता को नहीं दे रहे हैं. अदालत ने कहा की अगर उन्हें वहां रहना है तो वे नौकरी छोड़ दे,लेकिन किसी भी स्थिति में उन्हें दोहरा लाभ नहीं लेने दिया जा सकता है.
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