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विधायक मेवा लाल की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई टली

Updated at : 25 Jul 2017 1:52 PM (IST)
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विधायक मेवा लाल की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई टली

पटना : मुंगेर के तारापुर से जदयू विधायक एवं बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के तत्कालीन वीसी मेवालाल चौधरी की अग्रिम जमानत याचिका परसुनवाई मंगलवार को पटना हाइकोर्ट में टल गयी. न्यायाधीश राजेंदर कुमार मिश्रा की एकलपीठ ने विधायक मेवालाल चौधरी की ओर सेदायर अग्रिम जमानत याचिका पर मंगलवार को सुनवाई होनी थी. तत्कालीन राज्यपाल के […]

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पटना : मुंगेर के तारापुर से जदयू विधायक एवं बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के तत्कालीन वीसी मेवालाल चौधरी की अग्रिम जमानत याचिका परसुनवाई मंगलवार को पटना हाइकोर्ट में टल गयी. न्यायाधीश राजेंदर कुमार मिश्रा की एकलपीठ ने विधायक मेवालाल चौधरी की ओर सेदायर अग्रिम जमानत याचिका पर मंगलवार को सुनवाई होनी थी.

तत्कालीन राज्यपाल के आदेश पर दर्ज हुआ था मामला

वर्तमान में तारापुर से जदयू के विधायक मेवालाल चौधरी पर बिहार के तत्कालीनराज्यपाल रामनाथ कोविंद के आदेश पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर केवीसी डॉ अजय कुमार सिंह ने सबौर थाने में प्राथमिकी दर्ज करायी थी.मेवालाल चौधरी के ऊपर सबौर थाने में कांड संख्या 35/2017 भादवि की धारा409, 420, 467, 468, 471, 120 बी के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया था.

यह भी पढ़ें :नीतीश की पार्टी जदयू से निलंबित किये गये बिहार कृषि विश्वविद्यालय में नियुक्ति घोटाले के आरोपी मेवालाल

सहायक प्राध्यापक व कनीय वैज्ञानिकों की भर्ती में धांधली का है आरोप

मेवालाल चौधरी के ऊपर वर्ष 2012 में 161 सहायकप्राध्यापक और कनीय वैज्ञानिकों की भर्ती में धांधली का आरोप लगा था. साथ ही साथ उन पर आरोप लगाया गया था कि योग्य अभ्यर्थियों को साक्षात्कारऔर प्रोजेक्ट में कम अंक देकर उन्हें अयोग्य करार दिया गया है. साथ ही यह भी आरोप लगा किइस नियुक्ति में 15 से 20 लाख रुपये की बोली लगायी गयी थी, इससे कमयोग्यता वाले अभियार्थियों को नियुक्त किया गया. इस प्राथमिकी के दर्ज होतेही उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है.

याचिकाकर्ता ने खुद को बताया निर्दोष

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया था कि वर्तमान जदयू विधायक औरपूर्व वीसी डॉ मेवालाल चौधरी को इस मामले में फंसाया जा रहा है. क्योंकि, यह नियुक्ति 20 साक्षात्कार कमेटियों के जरिये 161 अभ्यर्थियों को चयनितकिया गया था. इनमें विश्वविद्यालय के 30 से ज्यादा वरीय अधिकारी शामिल थे. इस नियुक्ति में याचिकाकर्ता की कोई भूमिका नहीं है. वह सिर्फइस कमेटी के अध्यक्ष थे, जबकि इसमें पूरी तरह से एक एक्सपर्ट की कमेटीथी.

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