इबादतगाहों के पास बरस रही है रौनक

Published at :14 Jun 2017 8:12 AM (IST)
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इबादतगाहों के पास बरस रही है रौनक

पटना : मंगलवार की शाम 6.35 बजे का वक्त. राजधानी के सबसे पुराने हाइकोर्ट मजार के पास अस्थायी होटलों में पकौड़े छनने शुरू हो चुके थे. पास के एक फल दुकान में मालदह आम की सुगंध से भूख और गहरी हो जा रही थी. रसीले तरबूज भी आमंत्रित कर रहे थे. इधर रोजेदार अल्लाह की […]

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पटना : मंगलवार की शाम 6.35 बजे का वक्त. राजधानी के सबसे पुराने हाइकोर्ट मजार के पास अस्थायी होटलों में पकौड़े छनने शुरू हो चुके थे. पास के एक फल दुकान में मालदह आम की सुगंध से भूख और गहरी हो जा रही थी. रसीले तरबूज भी आमंत्रित कर रहे थे. इधर रोजेदार अल्लाह की इबादत करने के बाद धीरे-धीरे अपनी इफ्तारी खोलने के लिए एकत्र हो रहे थे.
आखिरकार 6.44 बजे का वक्त आ ही गया, जब इफ्तार का समय हो गया था. मो साबिर, मो अनवर, मो रिजवान, मो तनवीर और मो छोटे उस्ताद की टीम 16 घंटे के अन्न जल उपवास के बाद अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं और फलों के साथ पकौड़े ग्रहण करने लगते हैं.
उन्हीं के साथ मजार के आसपास दो बड़े-बड़े टेबल और बेंच पर सैकड़ों रोजेदार भी इफ्तार में शरीक हो जाते हैं. मो अनवर कहते हैं कि इस एक माह में हमारे बीच में भाईचारा अौर मजबूत होती है. मो रिजवान बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि देखिए कष्ट तो होता ही है. कष्ट नहीं हुआ तो त्योहार कैसा? मो तनवीर बताते हैं कि ग्यारह महीने तो हम अपनी मरजी से अपना जीवन जीते ही हैं. एक महीने का यह रमजान का वक्त ऐसा होता है जिसमें हम एक महीने नियमबद्ध होकर काम करते हैं. छोटे उस्ताद कहते हैं कि पूरा महीना बहुत अच्छा लगता है.
फुलवारीशरीफ : हाजी मो जानेशार ने रमजान में रोजा रखने और उसके सवाब के बारे में कहा िक रोजे की हालत में कान, आंख, पेट समेत शरीर के सभी अंगों को बुराइयों से बचाना जरूरी होता है, तभी रोजा मुकम्मल माना जाता है. रमजान बारह महीनों में सबसे अधिक बरकतवाला महीना है.
उन्होंने कहा कि रोजे की हालत में नमाज और कुरान पढ़ने से रोजेदारों को सुकून मिलता है. अल्लाह ताला ने रोजा हर मोमिन पर फर्ज करार दिया है. रोजा को जानबूझ कर छोड़ने वाले आजाएब के हकदार होंगे. रोजेदारों के मुंह की खुशबू अल्लाह को बहुत पसंद है. इस महीने में शैतानों को कैद कर दिया जाता है. यह ऐसा मुबारक महीना है, जिसमें जन्नत के दरवाजे खोल दिये जाते हैं. परंतु वह लोग बड़े बदकिस्मत हैं, जो सिर्फ भूखे-प्यासे रहते हैं और इसे ही रोजा समझ कर संतुष्ट रहते हैं.
वास्तव में वह रोजे की हकीकत को नहीं जानते और उसके सवाब से वंचित रह जाते हैं. भूखे-प्यासे रह कर इबादत करनेवाले अल्लाह के बहुत करीब होते हैं और उनकी हर दुआ कबूल कर ली जाती है.
कितने ही रोजेदार ऐसे हैं, जिन्हें उनके रोजे से भूख-प्यास के अलावा कुछ नहीं मिलता. जो रोजेदार रोजे की हालत में भी झूठ, चोरी, कालाबाजारी आदि गुनाहों से तौबा नहीं करता, उसे अल्लाह की रहमतों से महरूम ही रहना पड़ता है. रोजे की हालत में जहां गुनाहों से परहेज लाजिम है, वहीं बेफायदा और फालतू कामों से बचना जरूरी है. रोजे के जरूरी आदाब में यह बात भी शामिल है कि जिस तरह रोजेदार खाने-पीने से मुंह बंद रखता है, उसी तरह वह दूसरे गुनाहों को भी पूरी तरह छोड़ दे.
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