नवादा के वारिसलीगंज में सदियों पुरानी परंपरा से किसान परेशान, धान की खेती हो रही प्रभावित
नवादा जिले के वारिसलीगंज प्रखंड में सदियों पुरानी एक परंपरा किसानों की खुशहाली छीन रही है. नागपंचमी के बाद ही धान रोपाई की प्रथा के कारण समय पर बारिश और नहरों में पानी होने के बावजूद किसान खेतों में उतर नहीं पा रहे हैं, जिससे उपज पर गंभीर असर पड़ रहा है.
Nawada News: नवादा जिले के वारिसलीगंज प्रखंड के कई गांवों में सदियों पुरानी परंपरा किसानों की खेती और आर्थिक स्थिति पर भारी पड़ रही है. क्षेत्र के मकनपुर, गोपालपुर, दरियापुर और लीला बिगहा समेत दर्जनों गांवों में नागपंचमी के बाद ही धान रोपाई की अनूठी परंपरा चली आ रही है, जिसके कारण समय पर बारिश होने के बावजूद किसान खेतों में नहीं उतर पा रहे हैं.
पानी उपलब्ध, फिर भी हाथ पर हाथ धरे किसान
आषाढ़ महीने में हुई अच्छी बारिश और नहरों में पानी आने के बाद प्रखंड के 80 प्रतिशत गांवों में धान रोपाई का कार्य युद्ध स्तर पर पूरा हो चुका है. हालांकि, पौराणिक परंपरा से बंधे गांवों के किसान आहर-पैन में पानी का बहाव देखते रहने को मजबूर हैं. वे समय पर रोपाई शुरू न कर पाने के कारण अंदर ही अंदर निराश और खिन्न महसूस कर रहे हैं.
अधिक लागत और कम उपज की दोहरी मार
नागपंचमी बीतने के बाद जब ये किसान रोपाई शुरू करते हैं, तब तक बारिश का चक्र बदल चुका होता है. ऐसी स्थिति में किसानों को डीजल पंप चलाकर अधिक पूंजी और श्रम लगाना पड़ता है. देर से रोपाई होने के कारण न सिर्फ धान की पैदावार प्रभावित होती है, बल्कि रबी फसल की बुआई में भी देरी का सामना करना पड़ता है.
परंपरा तोड़ने को लेकर असमंजस में ग्रामीण
किसानों का कहना है कि प्रकृति के बदलते मिजाज के बीच समय पर खेती करना ही सबसे समझदारी भरा निर्णय है. स्थानीय किसान श्रवण कुमार और अर्जुन सिंह ने बताया कि परंपरा के कारण दो बार नहर और बारिश का पानी यूं ही बहकर निकल गया, जबकि अन्य गांवों की फसलें लहलहा रही हैं. भारी नुकसान सहने के बावजूद इस सदियों पुरानी सामाजिक बंदिश को तोड़ने की पहल करने में किसान संकोच कर रहे हैं.
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