जातीय समीकरण और विकास पर होगा मुकाबला

अजय कुमार नवादा : 2011 की जनगणना के अनुसार, नवादा की आबादी 22 लाख 26 हजार 653 है. यह संसदीय सीट छह विधानसभाओं से मिल कर बनी है. इनमें नवादा जिले के हिसुआ, रजाैली (सुरक्षित), गोविंदपुर, नवादा व वारिसलीगंज के अतिरिक्त शेखपुरा जिले का बरबीघा विधानसभा क्षेत्र भी शामिल है. 2009 के परिसीमन के पहले […]
अजय कुमार
नवादा : 2011 की जनगणना के अनुसार, नवादा की आबादी 22 लाख 26 हजार 653 है. यह संसदीय सीट छह विधानसभाओं से मिल कर बनी है. इनमें नवादा जिले के हिसुआ, रजाैली (सुरक्षित), गोविंदपुर, नवादा व वारिसलीगंज के अतिरिक्त शेखपुरा जिले का बरबीघा विधानसभा क्षेत्र भी शामिल है. 2009 के परिसीमन के पहले नवादा संसदीय क्षेत्र में गया जिले का अतरी विधानसभा क्षेत्र में था.
वर्ष 1957 से पहले नवादा गया पूर्वी संसदीय सीट का हिस्सा था. वर्ष 1957 में नये परिसीमन के तहत संसदीय क्षेत्र संख्या-34 के रूप में इसका गठन हुआ. सत्यभामा देवी व रामधनी दास संयुक्त रूप से सांसद निर्वाचित हुए. वर्ष 1962 में यह बदल कर संसदीय क्षेत्र संख्या-42 (सुरक्षित) हो गया. रामधनी दास इंडियन नेशनल कांग्रेस से पहले सांसद के रूप में चुने गये. वर्ष 1967 व 1971 के आम चुनाव में यह सीट सामान्य ही रही. वर्ष 1977 से 2004 तक यह सीट सुरक्षित रही. इसके बाद 2009 के परिसीमन में इसका क्रमांक संसदीय सीट संख्या-39 करते हुए इसे सामान्य सीट बना दिया गया. सामान्य सीट होने के बाद डॉ भोला सिंह भाजपा के टिकट पर पिछली बार चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे थे.
वोटों में दिख रहा बिखराव
लंबे समय तक जारी जातीय हिंसा के दौर से बाहर निकल रहे लोकसभा क्षेत्र को नक्सलवाद का भी सामना करते रहना पड़ा है. सवर्ण वोटों की संख्या के आधार पर कई दिग्गज भूमिहार प्रत्याशियों की इस पर नजर लगी है. वर्ष 2009 में परिसीमन के बाद सामान्य सीट होने पर भाजपा-जदयू गठबंधन ने नवादा में भूमिहारों के लिए दरवाजा खोला. लेकिन, वर्तमान की स्थिति तब से अलग है. गठबंधन टूटने के साथ ही वोटों का बिखराव दिखने लगा है. नवादा क्षेत्र में राजनीतिक रूप से अहम भूमिका निभानेवाली दो बड़ी जातियों के नेता-कार्यकर्ता अलग-अलग गोलबंदी में जुट गये हैं. लंबे समय से कांग्रेस इस सीट से दूर रही है.
ऐसे में राजद जैसी उसकी सहयोगी पार्टी को कांग्रेस से ज्यादा उम्मीद जताने की जरूरत नहीं महसूस की जा रही. अधिकतर लोगों का मानना है कि विकास ही चुनाव का नतीजा तय करेगा. यहां जातीय वोट बैंक भी हैं ही. इनका लोस चुनाव में अहम रोल हो सकता है. ऐसे में किसी जाति विशेष अथवा लहर की बैसाखी पर चुनावी बैतरणी पार कर पाना किसी के लिए संभव नहीं दिख रहा. इस बीच 16वीं लोकसभा चुनाव के लिए बिगुल बजने से दलों की सक्रियता तेज हो गयी है. इसके बावजूद उम्मीदवारों की घोषणा नहीं होने से नेताओं-कार्यकर्ताओं के साथ ही मतदाताओं के बीच भी अटकलों का दौर अब तक जारी ही है. कम से कम राजद-कांग्रेस गंठबंधन को छोड़ बाकी दलों के उम्मीदवारों को लेकर गपशप का सिलसिला तो जारी ही है.
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