रखे-रखे चरखों में लग गयी जंग

Published at :10 Apr 2015 7:47 AM (IST)
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रखे-रखे चरखों में लग गयी जंग

रजौली में बंद पड़ा सूत काटने का काम यहां चलते थे 85 बड़े व 23 छोटे चरखे क्षेत्र की करीब सात सौ महिलाओं को मिलता था काम रजौली : रजौली प्रखंड में चल रहे चरखा उद्योग 11 वर्षो से बंद पड़ा है. चरखा उद्योग के बंद होने का कारण आर्थिक तंगी व सिल्क, सूती व […]

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रजौली में बंद पड़ा सूत काटने का काम
यहां चलते थे 85 बड़े व 23 छोटे चरखे
क्षेत्र की करीब सात सौ महिलाओं को मिलता था काम
रजौली : रजौली प्रखंड में चल रहे चरखा उद्योग 11 वर्षो से बंद पड़ा है. चरखा उद्योग के बंद होने का कारण आर्थिक तंगी व सिल्क, सूती व ऊन वस्त्रों के लिए कच्चे माल की कमी बतायी जा रही है. काम नहीं होने के कारण गुजरात से 2,86,445 रुपये की लागत से लाये गये उद्योग के 85 बड़े चरखे व 23 छोटे चरखों में जंग लग रहा है.
जब चरखा उद्योग में काम होता था तो क्षेत्र की सात सौ महिलाओं को आसानी से काम मिल जाता था. खादी ग्रामोद्योग में नरहट प्रखंड की महिलाएं भी काम करती थीं. जानकार सूत्रों का कहना है कि अगर प्रदेश सरकार चरखों की मरम्मत करा दे तो सूत काटने का रोजगार फिर से शुरू हो सकेगा.
चरखा चलाने वाली महिलाओं को प्रतिदिन चार सौ रुपये तक मजदूरी खादी ग्रामोद्योग द्वारा मिलेगा. गौरतलब है कि रजौली के अलावा जिन स्थानों पर सूत काटा जा रहा है. वहां पर वर्तमान में बुनकर सिल्क की एक किलो सूत काटने पर 180 रुपये से लेकर 250 रुपये तक मिलता है. वही सूती का सूत काटने पर सौ से 120 रुपये तक की मजदूरी मिलती है. खादी भंडार रजौली के भवन में चरखा चलाने के लिए चरखा शेड भी बना है. फिलहाल सभी चरखे खादी भंडार के गोदाम में रखे-रखे जंग खा रहे हैं.
बंद हो गया कच्च माला आना: कच्चे माल की कमी व खादी वस्त्रों की खरीद पर मिलने वाली छूट की राशि समय पर सरकारों द्वारा खादी भंडार को नहीं मिलने सूत काटने का काम बंद हो गया. पहले केंद्र सरकार खादी कपड़ों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराती थी. बिहार में हाजीपुर में लगे प्लांट से सभी स्थानों पर कच्चा माल आता था, लेकिन उस प्लांट के बंद हो जाने के बाद से कच्चे माल की सप्लाइ बंद हो गयी है.
बंद हो गयी सब्सिडी भी: 1967-68 से रजौली में चरखा उद्योग चल रहा था. उस समय ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए यह आजीविका चलाने का सबसे बड़ा साधन था. महिलाएं प्रतिदिन सुबह 10 बजे से चार बजे तक चरखे पर सूत काटती थी. पहले सरकार इस पर सब्सिडी भी देती थी. लेकिन, अब सब्सिडी देना भी बंद कर दिया गया है. चरखा चलावाने वाली संस्था को भी लाभ भी मिलना बंद हो गया है, जिसके कारण यह संस्था दिन-प्रतिदिन कमजोर हो गयी है. खादी भंडार के प्रबंधक ने यह भी बताया कि 75 प्रतिशत रुपये सरकार से व 25 प्रतिशत रुपये संस्था स्वयं लगा कर चरखा उद्योग चलाती थी.
एक करोड़ रुपये बकाया: रजौली खादी भंडार में 1991 से अब तक करीब एक करोड़ 50 हजार रुपये सरकार के पास बकाया है. प्रबंधक के अनुसार, इसमें से 75 हजार रुपये ही मिलने की संभावना है. आर्थिक समस्या के कारण भी चाह कर भी काम शुरू नहीं हो पा रहा है. चरखा चलाने के लिए पहले सरकार से सब्सिडी मिलनी बंद हुई, फिर कच्चा माल मिलना बंद हुआ इसके अलावा चरखों की मरम्मती समय पर नहीं होती है.
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