ककोलत में स्नान कर बिसुआ पर्व का उठाया लुफ्त

Published at :15 Apr 2014 5:11 AM (IST)
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ककोलत में स्नान कर बिसुआ पर्व का उठाया लुफ्त

नवादा : हर साल बिसुआ पर्व पर ककोलत जल प्रपात के शीतल जल में स्नान कर सत्तु खाने की परंपरा का इंतजार स्थानीय लोगों को बेसब्री से रहता है. 14 अप्रैल इसके लिए तिथि तय है. इस दिन से यहां चार दिवसीय बिसुआ मेला भी लगता है. इसमें जिले भर के लोग पहुंचते हैं. यहा […]

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नवादा : हर साल बिसुआ पर्व पर ककोलत जल प्रपात के शीतल जल में स्नान कर सत्तु खाने की परंपरा का इंतजार स्थानीय लोगों को बेसब्री से रहता है. 14 अप्रैल इसके लिए तिथि तय है. इस दिन से यहां चार दिवसीय बिसुआ मेला भी लगता है. इसमें जिले भर के लोग पहुंचते हैं. यहा आने वाले लोग सत्तु खाने के साथ स्नान कर मेले में खरीदारी भी करते हैं.

सोमवार से शुरू विशुआ पर्व का सैकड़ों सैलानियों ने आनंद उठाया. यहां स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के भी सैलानी शीतल जल प्रपात का लुप्त उठाने आते हैं. चारों तरफ पहाड़ियों से घिरी ककोलत की मनोरम वादियों में आकर लोग इस तरह मोहित हो जाते हैं कि शाम तक स्नान करते ही रह जाते हैं. इसके पहाड़ी क्षेत्रों में औषधीय पौधे भी पाये जाते हैं.

यहां का मिसाल है कि जितना खाना खाया जाता है वह ककोलत के शीतल पानी से पच जाता है. बिसुआ पर्व को लेकर व इसके विकास को लेकर ककोलत विकास परिषद बनाया गया है, जो हर साल मेला का आयोजन करता है. इतना ही नहीं 5 अक्तूबर, 2013 को ककोलत जल प्रपात के नाम से पांच रुपये का डाक टिकट भी जारी किया गया है. सुरंम्भ वादियों में छिपा ककोलत जल प्रपात नवादा वासियों के लिए प्रकृति का अनूठा उपहार है.

यहां न सिर्फ अलौकिक प्राकृतिक छटा का अहसास होता है, बल्कि इसका धार्मिक महत्व भी है. यहां स्नान करने से सर्प योनी से मुक्ति मिलती है. यहां से कई पाषाण काल के उपकरण भी पाये जाते हैं. कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडव अज्ञातवास के दौरान यहां कुछ दिन रुके थे. बता दें कि यहां प्रत्येक वर्ष मार्च माह से ही सैलानियों का आना शुरू हो जाता है. यहां के केयर टेकर यमुना पासवान सैलानियों का खूब ध्यान रखते हैं. कहते हैं की कश्मीर धरती का स्वर्ग है तो ककोलत बिहार का कश्मीर है.

चुनाव के कारण दिखा असर: ककोलत महोत्सव पर चुनाव का असर साफ दिखा है. चुनाव के कारण परिषद् ने भी आयोजन में कोई खास रुचि नहीं दिखाई है. इसके कारण महोत्सव महज औपचारिकता बन कर रह गया है.

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