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बिहारशरीफ : मिश्री-बताशे आदि की गिनती अब मिठाई में तो नहीं होती है, लेकिन पूजा-पाठ तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर इनका काफी महत्व है. स्थानीय कटरा पर निवासी तथा बताशा निर्माता विनोद कुमार बताते हैं कि जब मिठाइयों की बाजारों में इतनी भरमार नहीं थी. उन दिनों लोग अपने नाते-रिश्तेदारों के यहां मिश्री-बताशे आदि संदेश […]

बिहारशरीफ : मिश्री-बताशे आदि की गिनती अब मिठाई में तो नहीं होती है, लेकिन पूजा-पाठ तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर इनका काफी महत्व है. स्थानीय कटरा पर निवासी तथा बताशा निर्माता विनोद कुमार बताते हैं कि जब मिठाइयों की बाजारों में इतनी भरमार नहीं थी. उन दिनों लोग अपने नाते-रिश्तेदारों के यहां मिश्री-बताशे आदि संदेश के रूप में भी ले जाते थे.

लोग बड़े ही चाव से बिहारशरीफ के मिश्री-बताशे खाते थे. समय में बदलाव के साथ अब यह सिर्फ पूजा तथा धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित होकर रह गया है. इसलिए बिक्री भी साधारण है तथा बचत भी कम ही है. उन्होंने बताया कि चार-पांच पीढ़ियों से यहां पर लगभग 40 घरों में बताशे बनाने का कार्य किया जा रहा है तथा इस इलाके की पहचान मिश्री-बताशा मंडी के रूप में बनी है. हालांकि बचत कम होने के कारण अब अगली पीढ़ी के बच्चे इससे दूरी बनाने लगें हैं. अन्नू कुमारी, रूबी कुमारी तथा लवली कुमारी इंटर तथा बीए पास कर भी अपने पारंपरिक कारोबार से जुड़ी है.

उन्होंने ने बताया कि सपरिवार बताशे बनाने का कार्य करते हैं. घर में मां-पिताजी, दादाजी आदि को बताशे बनाते देखकर वे भी इसी व्यवसाय से जुड़ गये. लगातार चूल्हे तथा चाशनी की गर्मी में रहकर काम करना पड़ता है. इसके बावजूद किसी प्रकार परिवार का भरण-पोषण हो पाता है.

सालाना 300 क्विंटल बताशे का होता निर्माण : कटरा पर स्थित बताशा मंडी में पूरे साल भर में लगभग 300 क्विंटल बताशे का निर्माण घरेलू स्तर पर ही किया जाता है. यहां से पूरे जिले के व्यवसायी बताशा खरीदकर बेचने के लिए ले जाते हैं. इतना सारा बताशा कारीगरों द्वारा कोयले के चूल्हे पर चीनी की चाशनी तैयार कर बनाया जाता है. अधिकांश घरों में परिवार के सारे सदस्य मिल-जुलकर बताशा बनाने का कार्य करते है. कारीगरों का कहना है कि यदि अलग से मजदूर रखेंगे तो बचत की सारी रकम मजदूरी पर खर्च हो जायेगी. इसलिए पूरे परिवार मिल-जुलकर काम करते हैं. कोयले की कीमत में भारी वृद्धि का भी प्रभाव इस व्यवसाय में परेशानी का प्रमुख कारण है.
स्वर्णकारों में थामी कलछी : ्थानीय कटरा पर बताश निर्माण से जुड़े अधिकांश लोग सोनार जाति से हैं तथा अपना मूल व्यवसाय से हटकर मिश्री-बताशा बनाने का कार्य कई पीढ़ियों से करते आ रहे हैं. इस संबंध में राजकुमार स्वर्णकार ने बताया कि पता नहीं उनके पूर्वजों ने किन परिस्थितियों में सोना-चांदी का जेवर बनाने के बजाय इस कठिन पेशे को अपनाया. अब तो इसी व्यवसाय में जीना-मरना है. हमलोगों को किसी प्रकार की सरकारी मदद भी नहीं मिलती हैं जिससे व्यवसाय को ओर सुदृढ़ बनाया जा सके. जैसे-तैसे पुश्तैनी धंधे को चलाकर जीवन यापन कर रहे है.
Prabhat Khabar Digital Desk
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