सुजनी कला से हर महीने एक करोड़ कमा रही महिलाएं

Published at :28 Jan 2025 1:29 AM (IST)
विज्ञापन
सुजनी कला से हर महीने एक करोड़ कमा रही महिलाएं

सुजनी कला से हर महीने एक करोड़ कमा रही महिलाएं

विज्ञापन

गायघाट का भूसरा गांव सुजनी कला का बना केंद्र

एक हजार महिलाएं इस कला से हुई आत्मनिर्भर

उपमुख्य संवाददाता, मुजफ्फरपुर

गायघाट का भूसरा गांव सुजनी कला का हब बन गया है. इसे जिले का यह पहला गांव है, जहां एक हजार ग्रामीण महिलाएं सुजनी कला से आत्मनिर्भर हुई हैं. यहां बेडशीट, कुर्ता और दुपट्टा और सूट पर सुजनी कला बनाने के लिए चार सौ से दस हजार रुपए मिलते हैं. सुजनी फाउंडेशन ओर जीविका सहित अन्य संस्थाओं की ओर से इन महिलाओं को काम मिलता है. इनका बनाया हुआ सुजनी देश हीं नहीं, विदेशों में जाता है. यह ग्रामीण महिलाएं इस कला से आर्थिक रूप से सशक्त हुई हैं और अन्य महिलाओं को भी इसका प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार से जोड़ रही हैं. सुजनी कला के लिए इस बार की पद्मश्री निर्मला देवी भी 39 वर्षों से इस कला से जुड़ी हैं. देश ही नहीं, विदेशों में इनके काम को सराहा गया है. इस कला से जीविका की करीब 350 दीदियां जुड़ी हुई हैं. इस कला के जरिये यहां की महिलाएं महीने में एक करोड़ तक की कमायी कर रही हैं.

दादी-नानी के हाथों की कला को मिली पहचान

दादी-नानी की हाथों की कला सुजनी से महिलाओं को पहचान मिली है. सुई-धागा की रंगीन दुनिया अब किसी परिचय की मोहताज नहीं है. इस कला को जीआइ टैग भी मिल चुका है. वर्तमान में सुजनी कला की छाप रजाई, सूती, खादी, सिल्क साड़ी, कुर्ता, परदा, बेडशीट, झोला, लेडीज बैग, तकिया के खोल, दुपट्टा, रूमाल सहित अन्य कपड़ों पर दिखायी देती है. पहले महिलाएं फटी हुई चादर तो कभी किसी कपड़े की उघरी सिलाई छुपाने के लिए अपनी कला से छोटे-छोटे फूल बना देती थी. इनकी यही सुजनी कला ने मुजफ्फरपुर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलायी है. आज से 36 वर्ष पहले इस गांव में सिर्फ तीन महिलाएं सुजनी कला बनाया करती थी. एक सुजनी कला के लिए महिलाओं को बीस रुपये मिलते थे. उस वक्त किसी ने सोचा नहीं था कि आने वाले समय में देश-विदेश में अपनी पहचान बनाएगी.

वर्जन

सुजनी कला मुजफ्फरपुर की बनी पहचान

सुजनी कला को ऐसी पहचान मिलेगी, पहले इसकी उम्मीद नहीं थी. मां जानकी देवी से इस कला को सीखी थी. उस वक्त पुराने कपड़े पर सुजनी बनाया करती थी. सुजनी से कभी-कभी कुछ रुपए आ जाते थे. 1990 के बाद से इस कला का विस्तार हुआ. कई एनजीओ के मार्फत काम मिलने लगा. फिर भी बहुत ज्यादा काम नहीं था, लेकिन हाल के तीन-चार वर्षों में इस कला को पहचान मिली. विदेशों में जब सुजनी कला के कपड़ों की मांग होने लगी तो हमलोगों को काम भी मिलने लगा. यहां की महिलाएं भी इस कला को सीख कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने लगी.

– पद्मश्री निर्मला देवी, भूसरा

अब काम में कमी नहीं, प्रशिक्षित हो रही महिलाएं

पिछले 25 साल से सुजनी कला बना रही हूं. सुजनी फाउंडेशन से हमलोगों को काम मिलता है. बेडशीट, ऑयल हैंगर, कुर्ता, सूट और दुपट्टा पर सुजनी कला बनाने के लिए आता है. जैसा काम होता है, उसी हिसाब से मेहनताना लिया जाता है. अगर पूरे बेडशीट पर सुजनी कला बनाया जाता है तो दस हजार तक भी मिल जाता है. पहले हमलोगों को बहुत कम काम मिलता था, लेकिन अब काम ज्यादा हो गया है. ग्रामीण क्षेत्र की कई महिलाओं को इस कला से जोड़ रही हूं. उन्हें प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे यहां की महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत हो सके.

– रीना कुमारी, भूसरा

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
Prabhat Khabar News Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar News Desk

यह प्रभात खबर का न्यूज डेस्क है। इसमें बिहार-झारखंड-ओडिशा-दिल्‍ली समेत प्रभात खबर के विशाल ग्राउंड नेटवर्क के रिपोर्ट्स के जरिए भेजी खबरों का प्रकाशन होता है।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन