बज्जिका की पहली फीचर फिल्म आजूर को मिला बेस्ट डायरेक्शन का अवार्ड
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 21 Dec 2024 12:41 AM
बज्जिका की पहली फीचर फिल्म आजूर को मिला बेस्ट डायरेक्शन का अवार्ड
मुजफ्फरपुर.
बज्जिका की पहली फीचर फिल्म आजूर को कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म में बेस्ट डायरेक्शन का अवार्ड मिला. सात से 11 दिसंबर तक चलने वाले इस फिल्म फेस्टिवल में फिल्म के निर्देशक आर्यन चंद्र प्रकाश को यह अवार्ड दिया गया. साथ ही पुरस्कार के तौर पर पांच लाख की राशि प्रदान की गयी. इसके अलावा फिल्म का चयन केरल फिल्म फेस्टिवल के लिए भी किया गया है. फिल्म का निर्माण सीतामढ़ी के श्रीरामपुर संवाद फांउडेशन ने किया था. फिल्म के अधिकतर कलाकारों ने पहली बार कैमरा फेस किया था. कलाकारों में प्रीथिपाल सिंह मथुरा, नूतन कुमारी और अर्पित चिक्कारा की मुख्य भूमिका रही. निर्देशन के अलावा फिल्म की कथा और पटकथा भी सीतामढ़ी के रहने वोल आर्यन चंद्र प्रकाश ने लिखी है. बज्जिका क्षेत्र के लिए गौरव की बात यह है कि इस बोली में बनी पहली ही फिल्म इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में अवार्ड पाने में सफल रही. आजूर एक 10 वर्षीय उत्तर बिहार की लड़की सलोनी की मार्मिक और प्रेरणादायक कहानी है, जो अपनी शिक्षा के लिए पारंपरिक सामाजिक मानदंडों को चुनौती देती है. अपनी मां की आकस्मिक मृत्यु के बावजूद, सलोनी ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों का सामना करती है. घर का कामकाज संभालती है, अपने पिता की मदद करती है और समाज की आलोचनाओं को सहन करती है. सलोनी के पिता एक लौंडा नाच दल के गायक-संगीतकार हैं, सह हर परिस्थिति में उसका साथ देते हैं. फिल्म में सलोनी की यात्रा को उन लड़कों की कहानियों से भी जोड़ा गया है जो सोशल नेटवर्किंग की दुनिया से प्रभावित हैं, जिससे यह पता चलता है कि कैसे आधुनिक दुनिया ग्रामीण जीवन के ताने-बाने से जुड़ती है.अपने समुदाय के कौशल को देना था मंच
फिल्म के निर्देशक आर्यन चंद्र प्रकाश ने दिल्ली विश्विवद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की. आर्यन ने बताया कि पढाई पूरी करने के बाद देश के कई हिस्सों का भ्रमण किया. इस दौरान पता चला कि बिहार के लोग सभी जगह हैं और माइग्रेशन बहुत है. वह अपने गांव आकर कुछ काम करना चाहते थे, इसलिए वापस आकर गांव में ही सामुदायिक परियोजना पर काम करने लगे. उनकी इच्छा थी कि वह बज्जिकांचल की संस्कृति को लोगों तक पहुंचाएं. इस उद्देश्य से फिल्म की कथा लिखी और ग्रामीण क्षेत्र के कलाकारों को प्रशिक्षित करने लगा.दो घंटे चार मिनट की है फिल्म
थिएटर से जुड़े होने के कारण कुछ अनुभव था. फिल्म की शूटिंग 2018 में शुरू की गयी. सीतामढ़ी के विभिन्न गांवों में जाकर शूट किया. फिल्म में मैंने अपने समाज के संघर्ष और उनके जीवन शैली को रखने की काेशिश की है. यह फिल्म दो घंटे चार मिनट की है. इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बज्जिका की पहली फिल्म को अवार्ड मिलना सीतामढ़ी ही नहीं, पूरे बज्जिकांचल के लिए गर्व की बात है. मैंने बज्जिका की संस्कृति को लोगों के सामने रखा है. इस फिल्म को यूरोपियन फिल्म फेस्टिवल में भी ले जाने की योजना है.
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