मॉनसून में देरी से धान की फसल होगी प्रभावित
Updated at : 18 Jun 2018 5:27 AM (IST)
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मुजफ्फरपुर : मॉनसून के विलंब से पहुंचने से धान की खेती पर इसका विपरीत असर पड़ रहा है. किसानों को बिचड़ा डालने में परेशानी हो रही है. लंबे अवधि वाले धान के बिचड़े की 25 मई से 10 जून तक रोपाई की जाती है. वहीं, मध्यम अवधि वाले धान के बिचड़े की रोपाई का समय […]
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मुजफ्फरपुर : मॉनसून के विलंब से पहुंचने से धान की खेती पर इसका विपरीत असर पड़ रहा है. किसानों को बिचड़ा डालने में परेशानी हो रही है. लंबे अवधि वाले धान के बिचड़े की 25 मई से 10 जून तक रोपाई की जाती है. वहीं, मध्यम अवधि वाले धान के बिचड़े की रोपाई का समय 16 से 25 जून है. जबकि, कम दिन के धान के बिचड़े की 25 जून से रोपाई की जाती है.
श्रीविधि से धान का बिचड़ा 12-16 दिन में व सामान्य धान का बिचड़ा 18-22 दिन में तैयार हाेता है. वहीं, आम तौर पर धान की फसल 90 से 110 दिन में तैयार होती है. लंबे अवधि वाले धान की फसल तैयार करने वाले किसान अपना बिचड़ा पंपिंग सेट के माध्यम से रोपाई कर चुके हैं. वहीं, मध्यम अवधि वाले धान का बिचड़ा की रोपाई करने के लिए किसान मॉनसून आने का इंतजार कर रहे हैं.
मॉनसून विलंब से आने के कारण किसानों को पंपिंग सेट का सहारा लेना पड़ रहा है. इससे किसानों को धान की खेती करने में लागत अधिक बढ़ जाती है. विलंब से रोपाई हाेने पर किसानों को खेती में अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है. पंपिंग सेट सौ रुपये प्रति घंटे की दर से लेकर किसान पानी की सिंचाई कर रहे हैं. कुढ़नी प्रखंड के केरमा गांव निवासी किसान संतोष कुमार बताते हैं कि मॉनसून विलंब होने के कारण किसानों की धान की फसल प्रभावित हो रही है. मॉनसून सही समय से आ जाता, तो तीन-चार पानी में धान की फसल तैयार हो जाती है.
वहीं, मॉनसून विलंब होने के कारण धान की फसल में चार से अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है. इससे किसानों का एक तरफ खर्च अधिक बढ़ जाता है. वहीं, दूसरी तरफ धान की पैदावार कम हो जाती है. किसानों काे प्रति कट्ठा पांच सौ रुपये लागत आती है. इस बार भी मौनसून विलंब होने के कारण किसानों को धान की फसल तैयार करने में परेशानी होगी. डीएओ डॉ केके वर्मा ने कहा कि मॉनसून विलंब होने से धान की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. धान के फसल को अधिक नमी की आवश्यकता होती है. इस कारण से किसानों को अधिक सिंचाई करनी होगी.
लीची टूटने के बाद करें पेड़ की छंटाई
मुजफ्फरपुर : लीची टूटने के बाद उसके पेड़ के पत्ते पर लीची माइट कीड़ा का प्रभाव बढ़ जाता है. इससे लीची के पेड़ को नुकसान पहुंचता है. पेड़ के पत्ते व टहनी की छंटाई कर देनी चाहिए. इससे फलन अच्छा होता है. पौधा संरक्षण विभाग के उपनिदेशक गोपाल शरण प्रसाद ने बताया कि कीड़े से प्रभावित पत्ते व टहनी की छंटाई करने से पेड़ का समुचित विकास होगा. इसमें फलन भी अच्छा होगा. छंटाई के छह माह बाद नयी शाखाएं निकल आयेंगी. वहीं, वर्षा होने पर लीची पेड़ के तनों के आस-पास डेढ़ दो मीटर का रिंग बनाकर उसमें खाद व वर्मी कंपोस्ट डालना चाहिए. इससे पेड़ में कीड़े का प्रभाव कम हो जाता है.
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