31 फीसदी महिलाओं में खून की कमी

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मधुबनी : एनएफएचएस-3 की वार्षिक रिपोर्ट ने मधुबनी जिले के लिये चिंता पैदा कर दी है. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जिले के गांवों में रहने वाली महिलाएं खून की कमी से कमजोर हैं. सर्वे रिपोर्ट में यह चिंता जतायी गयी है कि एनेमिक महिलाओ की तादाद लगातार बढ रही है. वहीं स्कूली छात्र-छात्रएं […]

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मधुबनी : एनएफएचएस-3 की वार्षिक रिपोर्ट ने मधुबनी जिले के लिये चिंता पैदा कर दी है. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जिले के गांवों में रहने वाली महिलाएं खून की कमी से कमजोर हैं. सर्वे रिपोर्ट में यह चिंता जतायी गयी है कि एनेमिक महिलाओ की तादाद लगातार बढ रही है. वहीं स्कूली छात्र-छात्रएं में भी एनीमिया का प्रभाव बढा है. उचित खानपान और पौष्टिक भोजन की कमी ने एनीमिया को बल दे रहा है.
जिले के ग्रामीण इलाकों में महिलाऐं परिवार की रीढ़ होती है. उन पर परिवार के तमाम् जबाबदेही होती है. पर अब ये कमजोर होने लगी है. नेशनल परिवार स्वास्थ्य सर्वे-3 की रिपोर्ट बताती है कि मधुबनी जिले के ग्रामीण इलाकों की 31 प्रतिशत से अधिक महिलाऐं इन दिनों खून की कमी से जूझ रही है.
चिकित्सीय भाषा में इसे ‘एनीमिया’ कहा जाता है. यह आंकड़ा पिछले तीन साल में चार प्रतिशत से अधिक बढ़ी है. ऐसे में 3 लाख से अधिक ग्रामीण महिलाएं ‘एनीमिया’ की शिकार बनी हुई है.
एनेमिक रोगी में हुआ इजाफा
सदर अस्पताल की चिकित्सक डॉ. रमा झा बताती है कि यहां इलाज अथवा प्रसव के लिये आने वाली दूसरी या तीसरी मरीज ‘एनेमिक’ पायी जाती है. दरअसल, सरकारी अस्पताल में अधिकांशत: कमजोर व ग्रामीण इलाकों की मरीज आती है. ऐसे में यह सर्वे तथ्यात्मक है. अगर और गहरायी से देखा जाय तो गांवों की महिलाओं की हालत और ज्यादा खराब हैं.
प्रसिद्ध प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. गुंजन त्रिवेदी बताती हैं कि ग्रामीण महिलाओं में एनीमिया के लक्षण तो बचपन से आ जाते हैं. जन्म से ही बच्ची को घर में दूसरा दर्जा मिलता है. ऐसे में उसकी देखभाल व रहन सहन भी उसी दज्रे की होती है. तब वह बचपन में ही हेल्मिन की शिकार हो जाती है. किशोरावस्था में खुन की कमी के कारण एनीमिया हो जाता है.
तीन साल में बढ़ा चार फीसदी
वर्ष 2011-12 में जिले में ‘एनेमिक’ ग्रामीण महिलाओं की तादाद 26.72 प्रतिशत थी. इस रिपोर्ट के बाद स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं (18-45) के बीच आयरन व अन्य दवाओं का वितरण अभियान के तहत किया गया था.
वर्ष 2012-13 में इसका प्रतिशत 25.15 प्रतिशत पर आ गया. पर पुन: वर्ष 2013-14 में 27.82, वर्ष 2014-15 में 30.69 तथा वर्ष 2015-16 में फरवरी माह तक यह औसत 31 प्रतिशत के करीब आ पहुंची है.
अपना ख्याल नहीं करतीं ग्रामीण महिलाएं
स्वयंसेवी संस्था ‘सखी’ की सचिव सुमन सिंह बताती हैं कि गांवों की महिलाएं परिवार को संवारने में ही जुटी रहती है. बच्चे, पति, सास-ससुर का ज्यादा से ज्यादा ख्याल रखने की कोशिश करती है. पर अपने पर इनका ध्यान नहीं देती. यही कारण है कि उनका खान-पान सही तरीके से नहीं हो पाता है और आगे चलकर वे ‘एनेमिक’ हो जाती हैं.
गांव में रहती 70 फीसदी आबादी
डीएम गिरिवर दयाल सिंह बताते हैं कि जिले की 70 फीसदी आबादी गांवों में रहती है.इसमें करीब 41.7 प्रतिशत आबादी पिछड़ा, अतिपिछड़ा, दलित व महादलितों की हैं. शिक्षा व जागरूकता के अभाव में इन तबकों की महिलाओं में ‘एनेमिक’ की समस्या अधिक पायी जाती है. जबकि अस्पतालों व स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर आयरन व फॉलिक एसिड की टैबलेट उपलब्ध होती हैं.
खून की कमी से गयी प्रसूता की जान
केस एक. फुलपरास रेफरल अस्पताल में 11 मई को 23 वर्षीय शांति देवी को प्रसव के लिये लाया गया था. डॉक्टरी जांच के बाद तुरंत रेफर कर दिया गया था. बताया गया कि उसके शरीर में खून की कमी है. ऐसे में यहां प्रसव कराया गया तो जान को खतरा हो सकता. हुआ भी यही, मधुबनी आते समय रास्ते में ही प्रसव हुआ, पर शांति बच नहीं सकी.
केस दो. कजियाना गांव रूखसाना प्रवीण का पूरा शरीर फूला हुआ है. पिछले दो हफ्ता से वह नियमित सदर अस्पताल आती है. बताया गया है कि उसके शरीर में खून की कमी है.
इसी वजह से पूरा शरीर फूल गया है. डॉक्टर ने जांच के बाद आयरन टैबलेट सहित अन्य दवाओं के साथ पौष्टिक भोजन लेने की सलाह दी है.
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