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विश्व हिंदी दिवस पर संगोष्ठी आयोजित, एआई के दौर में हिंदी के महत्व पर मंथन

जेआरएफ डॉ विभीषण कुमार ने अपने विचार रखते हुये कहा कि हिंदी में हमारी संस्कृति की सांस और परंपराओं की धड़कन समाई हुई है.

मधेपुरा.

जिला मुख्यालय स्थित जन लेखक संघ जिला इकाई मधेपुरा के तत्वावधान में विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर शनिवार को किरण पब्लिक स्कूल से पूरब स्थित शिक्षक डॉ ओमप्रकाश ओम के आवास पर एक विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी में साहित्य, शिक्षा एवं तकनीक के संदर्भ में हिंदी की भूमिका पर गंभीर चर्चा हुई. संगोष्ठी को संबोधित करते हुये डॉ जैनेंद्र कुमार ने कहा कि आज टेक्नोलॉजी, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के दौर में हिंदी का महत्व और बढ़ गया है. एआई की मदद से निबंध, कविता, कहानी एवं शोध-सामग्री जुटाना अपेक्षाकृत आसान हो गया है. हालांकि एआई पूर्ण विकल्प नहीं है, फिर भी यह एक उपयोगी सहायक के रूप में सामने आया है. जेआरएफ डॉ विभीषण कुमार ने अपने विचार रखते हुये कहा कि हिंदी में हमारी संस्कृति की सांस और परंपराओं की धड़कन समाई हुई है. एआई ने कार्यों को सरल बनाया है, लेकिन उस पर पूर्ण निर्भरता घातक हो सकती है. उन्होंने मूल पुस्तकों के अध्ययन को अनिवार्य बताते हुये भाषा और साहित्य से सीधे जुड़ाव पर बल दिया. मणिभूषण वर्मा ने हिंदी के शब्दकोश को विशाल भंडार बताते हुये कहा कि अंग्रेजी भाषा में भी हिंदी के अनेक शब्द प्रचलित हैं. उन्होंने इसके कई उदाहरण प्रस्तुत किये. पीजी सेंटर सहरसा के वरीय प्रो सिद्धेश्वर काश्यप ने कहा कि डॉ ओमप्रकाश वर्षों से विद्यार्थियों को हिंदी की ओर प्रेरित कर रहे हैं. हिंदी विश्वस्तरीय पहचान की भाषा है, जो मूल्यों और मानवता को स्थापित करती है. डॉ गजेंद्र कुमार (डाइट शिक्षक) ने कबीर के पदों का गायन कर हिंदी के महत्व को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया. विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के पूर्व एचओडी प्रो विनय कुमार चौधरी ने विश्व हिंदी दिवस मनाने के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं की भाषा है और विश्व पटल पर यह दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है. जन लेखक संघ के अध्यक्ष सियाराम मयंक ने कहा कि आज संस्थागत स्तर पर हिंदी को पीछे धकेला जा रहा है, जबकि समय-समय पर इस तरह की संगोष्ठियों से हिंदी को मजबूती मिलती है. उन्होंने चिंता व्यक्त की कि हिंदी अब भी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है और राजकाज में अंग्रेजी को प्राथमिकता दी जाती है. इस अवसर पर प्रो सिद्धेश्वर काश्यप ने डॉ ओमप्रकाश को डायरी और कलम भेंट कर सम्मानित किया. संगोष्ठी में स्मृति, रवींद्र कुमार, शिवजी और संतोष कुमार ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ किया. मंच संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ओमप्रकाश ने किया. इस मौके पर आरती, रोशनी, खुशबू, पूजा, सुम्मी, श्वेता, मनोज, मुकेश, प्रकाश सहित कई हिंदी प्रेमी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे.

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