हसनपुर से बरामद दो मूर्ति पहुंचायी गयी संग्रहालय

Published by : DHIRAJ KUMAR Updated At : 07 Jun 2025 9:27 PM

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विगत 30 अप्रैल 2025 को कवैया थाना अंतर्गत स्थानीय बिट्टू सिंह की खेत से मिट्टी खुदाई के दौरान भगवान बुद्ध की दोनों प्रतिमा प्राप्त हुई थी

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दोनों मूर्तियां भगवान बुद्ध की बतायी जा रही है, अब संग्रहालय की बढ़ायेगी समृद्धि

लखीसराय.

विगत 30 अप्रैल 2025 को कवैया थाना अंतर्गत स्थानीय बिट्टू सिंह की खेत से मिट्टी खुदाई के दौरान भगवान बुद्ध की दोनों प्रतिमा प्राप्त हुई थी. बरामद दोनों प्रतिमाओं को लखीसराय संग्रहालय नहीं लाकर हसनपुर ठाकुरबाड़ी में पहुंचा दिया गया था. जहां कतिपय लोगों ने दोनों प्रतिमाओं को हसनपुर ठाकुरबाड़ी के अंदर बड़ा ताखा में सीमेंट से जाम कर दिया. विगत सात मई को लखीसराय के संग्रहालय अध्यक्ष डॉ सुधीर कुमार यादव अपने कर्मियों के साथ जिला प्रशासन द्वारा प्रतिनियुक्त दंडाधिकारी एवं पुलिस बल के साथ हसनपुर ठाकुरबाड़ी से दोनों प्रतिमाओं को संग्रहालय लाने का प्रयास किया गया, परंतु असफल रहे थे. इसके बावजूद भी संग्रहालय अध्यक्ष व कर्मियों ने लगातार मूर्ति बरामद करने के लिए एक महीना तक संघर्ष करते रहे. इसी क्रम में शनिवार को संग्रहालय अध्यक्ष डॉ यादव के नेतृत्व में संग्रहालय के दीर्घा प्रभारी राजेश कुमार, लिपिक रवि राज, इलेक्ट्रिशियन राहुल कुमार, अंकित कुमार ने अचानक हसनपुर ठाकुरबाड़ी उपकरण के साथ पहुंच कर स्वविवेक से प्रबंधन समिति को प्रभावित कर दोनों प्रतिमाओं को सही सलामत कंक्रीट जाम से मुक्त कराकर संग्रहालय लाने में कामयाबी आखिर हासिल की. जो लखीसराय संग्रहालय समृद्धि में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. डॉ यादव ने बताया कि यह भगवान बुद्ध की आकृति धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा सिंहासनारूढ़ रूप में अंकन है जो काले पत्थर से निर्मित नौंवीं से दसवीं शताब्दी की होगी. यह भगवान बुद्ध का स्वरूप अत्यंत मोहन है, इस आकृति में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. काले पत्थरों पर उकेड़े हुए आकृति में भगवान बुद्ध धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा सिंहासनारूढ़ है. मूर्तियों के अंदर उत्कृट दायें एवं बायें में दो मन्नत स्तूप एवं दो परिचारियों को देखा जा सकता है, जिस सिंहासन पर भगवान बुद्ध को बैठे हुए दिखाया गया है. ठीक उनके नीचे दो सिंग विराजमान हैं. साथ ही साथ इनके चरम पादुका कमल के फूल पर आसीन है. भगवान बुद्ध के मुद्राओं पर विश्लेषण करेंगे तो हम पायेंगे कि इस मुद्रा में बुद्ध ने दोनों हाथों को उपयोग किये हैं, दाहिना हाथ की तर्जनी दाहिने अंगूठे को बायें तर्जनी बायें अंगूठे को छूती हुई दिखाई गयी है. जो एक प्रकार का वृत बनाते हुए धर्म के पहिये को दर्शाता है. दाहिना हथेली बाहर की ओर बायें हथेली हृदय के सामने है जो बायें एवं दायें हाथ आंतरिक और बाहरी दुनिया का अंतर्दृष्टि को दर्शाता है. जहां तीन बुद्ध, धम्म एवं संघ का प्रतिनिधित्व करता है. जिसका अर्थ धार्मिक शिक्षाओं का प्रसार करना.

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