लखीसराय में ग्रीन गोल्ड बनी मूंग की खेती, किसानों को एक साथ मिल रहा मुनाफा और जैविक खाद का फायदा

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Lakhisarai News-लखीसराय में ‘हरी चादर’ बन रही किसानों की ताकत, कम लागत में बढ़ रही आमदनी और मिट्टी की उर्वरता
Lakhisarai News-लखीसराय से अजीत सिंह की रिपोर्ट. लखीसराय जिले में ‘हरी चादर’ के नाम से पहचानी जाने वाली मूंग की खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है. यह फसल किसानों को दोहरा लाभ दे रही है. एक ओर जहां मूंग बेचकर अच्छी कमाई हो रही है, वहीं दूसरी ओर इसकी फसल खेतों के लिए प्राकृतिक जैविक खाद का काम कर रही है. यही कारण है कि जिले में बड़ी संख्या में किसान अब धान रोपाई से पहले मूंग की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं.
कम लागत में ज्यादा मुनाफा दे रही मूंग
कृषि विभाग की ओर से किसानों को हर साल 20 से 25 रुपये प्रति किलो की दर से मूंग का बीज उपलब्ध कराया जाता है. किसान मई के अंतिम सप्ताह तक इसकी बुवाई कर देते हैं और आषाढ़ माह शुरू होते ही फलियों की तुड़ाई का काम शुरू हो जाता है.
बाजार में मूंग की कीमत 70 से 80 रुपये प्रति किलो तक मिल रही है, जिससे किसानों को अच्छा मुनाफा हो रहा है. साथ ही इसकी दाल घर के उपयोग में भी आती है, जिसे सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है.
धान की खेती के लिए बन रही प्राकृतिक खाद
मूंग की खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि तुड़ाई के बाद खेत में बचा पौधा जैविक खाद में बदल जाता है. किसान खेत में पानी भरकर जुताई करते हैं, जिससे मूंग के पौधे गलकर मिट्टी में मिल जाते हैं और खेत की उर्वरता बढ़ जाती है.
इससे धान की रोपाई के दौरान अलग से खाद डालने की जरूरत कम पड़ती है. किसान इसे प्राकृतिक उर्वरक के रूप में देख रहे हैं, जिससे खेती की लागत भी घट रही है.
महिला मजदूरों को भी मिल रहा रोजगार
मूंग की फसल की तुड़ाई में ग्रामीण महिलाओं की बड़ी भूमिका होती है. खेतों में 2 से 3 बार तुड़ाई करायी जाती है. परंपरा के अनुसार तुड़ी गयी फसल का आधा हिस्सा मजदूरों को और आधा किसान को मिलता है.
इस व्यवस्था से गांवों में महिला मजदूरों को भी रोजगार और अतिरिक्त आमदनी मिल रही है.
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया फायदेमंद
हलसी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक सुधीर चंद्र का कहना है कि मूंग की खेती मिट्टी को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाती है. उन्होंने किसानों को धान रोपाई से पहले मूंग की खेती जरूर करने की सलाह दी है.
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लेखक के बारे में
By प्रत्युष प्रशांत
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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