पांच गांवों ने खत्म की मृत्युभोज की परंपरा, अब गरीब बेटियों की शादी में होगा खर्च
Published by : AMIT KUMAR SINH Updated At : 18 May 2026 1:01 PM
Death Feast Ban in Bihar: बिहार के लखीसराय में सामाजिक बदलाव की एक बड़ी मिसाल सामने आई है. पांच गांवों के लोगों ने मिलकर मृत्युभोज जैसी महंगी परंपरा को खत्म करने का फैसला लिया है. अब लाखों रुपये भोज पर खर्च करने की बजाय गरीब बेटियों की शादी और जरूरतमंदों की मदद में लगाए जाएंगे.
सूर्यगढ़ा (लखीसराय) से राजेश गुप्ता की खबर :
लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा प्रखंड स्थित निस्ता गांव में आयोजित पांच गांवों की महाबैठक में श्राद्ध भोज यानी मृत्युभोज के पूर्ण बहिष्कार का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया. राम-जानकी ठाकुरवाड़ी परिसर में हुई इस बैठक में बड़ी संख्या में ग्रामीण, जनप्रतिनिधि और प्रबुद्ध नागरिक शामिल हुए. बैठक में 90 प्रतिशत से अधिक लोगों ने हाथ उठाकर मृत्युभोज बंद करने के प्रस्ताव का समर्थन किया.‘चौरासी’ परंपरा पर लगा बड़ा ब्रेक
क्षेत्र के निस्ता, खेमतरणी स्थान, खर्रा, चाननिया और नवाबगंज गांवों में सामूहिक श्राद्ध भोज को ‘चौरासी’ के नाम से जाना जाता है. इस परंपरा में एक आयोजन में 12 से 15 हजार लोगों के भोजन की व्यवस्था की जाती थी.ग्रामीणों के अनुसार केवल चावल-दाल के इंतजाम में ही करीब 10 लाख रुपये तक खर्च हो जाते थे. इसका सबसे बड़ा असर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ता था, जो सामाजिक दबाव में कर्ज लेकर भोज आयोजित करने को मजबूर हो जाते थे.
“दिखावे से नहीं, सेवा से मिलती है असली प्रतिष्ठा”
बैठक की अध्यक्षता पूर्व मुखिया सह मुखिया प्रतिनिधि पप्पू यादव ने की, जबकि संचालन भगवान यादव ने किया. वक्ताओं ने कहा कि समाज में सच्ची प्रतिष्ठा दिखावे के भोज से नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सहायता से मिलती है.बैठक में यह भी कहा गया कि मृत्युभोज जैसी परंपराएं आर्थिक बोझ बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती हैं. इसलिए समय की मांग है कि समाज मिलकर ऐसी कुरीतियों को खत्म करे.अब गरीब बेटियों की शादी में होगा सहयोग
बैठक में निर्णय लिया गया कि पांचों गांवों में क्रमवार बैठक कर इस फैसले को और मजबूत किया जाएगा. इसके लिए एक महाकमेटी भी गठित की जाएगी, जो मृत्युभोज पर स्थायी रोक सुनिश्चित करेगी.सबसे खास बात यह रही कि अब मृत्युभोज पर खर्च होने वाले लाखों रुपये गरीब बेटियों की शादी और जरूरतमंद परिवारों की सहायता में उपयोग किए जाएंगे.सूर्यगढ़ा से शुरू हुई यह पहल अब सामाजिक सुधार की दिशा में एक नयी मिसाल मानी जा रही है और आसपास के क्षेत्रों में भी इसकी चर्चा तेज हो गयी है.
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