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छठ महापर्व यह संदेश देता है कि जो अस्त हुआ है वो उदय भी होगा

Updated at : 26 Oct 2025 7:22 PM (IST)
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छठ महापर्व यह संदेश देता है कि जो अस्त हुआ है वो उदय भी होगा

चुनाव संबंधी कार्यो में लापरवाही बरतने वाले कर्मियों को बख्शा नहीं जाएगा.

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-कृषक संस्कृति का देता है संदेश.

किशनगंजलोक आस्था के पर्वों में छठ महापर्व का स्थान अलग है. चार दिवसीय महापर्व छठ में अस्ताचलगामी सूर्य के साथ उदीयमान सूर्य की आराधना का विशेष महत्व है. इस पर्व में सर्वप्रथम अस्ताचलगामी सूर्य को और अगले दिन उदीयमान सूर्य की आराधना की जाती है. छठ व्रतियों में महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की संख्या कम होती है,यह पर्व चार दिनों में संपन्न होता है. दीपावली के बम-पटाखों के शोर-शराबे के थम जाने के बाद छठ पूजा का रंग चढ़ने लगा है. छठ करने वाले परिवारों में छठी मैया की पूजा-आराधना में गाए जाने वाले गीतों की स्वर सुनाई देने लगी हैं. आदि देव भगवान भास्कर की आराधना का यह महापर्व असल में प्रकृति की आराधना का भी त्योहार है. छठ पूजा बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश की कृषक सभ्यता का महापर्व है.खेतों में लहलहाती धान की फसल,उसकी सोने सरीखी पीली-पीली बालियां देखकर किसान मन प्रकृति के प्रति सहज ही कृतज्ञता से झुक जाता है. और वह “तुभ्यम वस्तु गोविंद,तुभ्यमेव समर्पये के भाव के साथ प्रकृति के प्रतीक सूर्य देव के आगे करबद्ध होकर उनकी आराधना करने लगता है.

छठ पूजा के आयोजन से जुड़े लोग बताते हैं कि यह एक ऐसा त्योहार है जिसका बाजार से कोई खास वास्ता नहीं है. इसका अपना ही बाजार होता है. जो खास इसी अवसर पर दिखाई देता है. उनका कहना है कि सूर्य देव को अर्घ्य देने के लिए जो भी वस्तुएं लाई जाती हैं, वे सभी एक किसान के घर में सहज ही उपलब्ध होती हैं.

चार दिवसीय इस अनुष्ठान में पवित्रता के साथ-साथ श्रद्धा में खोट होने पर दंड का भी भय बना रहता है़. वस्तुओं की अनिवार्यता से स्पष्ट होता है की यह पर्व आम जनजीवन को पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है़.वहीं कुछ लोग इस पर्व को अध्यात्म के प्रति और आरोग्य के समन्वय का पर्व भी मानते हैं. इसमें पूर्णत: कृषि पर आधारित वस्तुओं के उपयोग करने की परंपरा रही है़ चाहे वह मिट्टी के बर्तन का उपयोग, मिट्टी के चूल्हे पर पकवान बनाने की बाध्यता या अदरक, गन्ना, नींबू आदि मौसमी फलों को प्रसाद के रूप में चढ़ाने की परंपरा रही हो़ अर्घ देने नदी या तालाबों के किनारे जाने की परंपरा के चलते उसकी भी साफ सफाई हो जाती है़ इससे जल प्रदूषण को भी समाप्त करने का अवसर मिलता है़.छठ पूजा को महापर्व के नाम से अलंकृत किया गया है.इसकी उपासना से आत्मिक उत्कर्ष के साथ परिवार के सुख,सौभाग्य के प्राप्ति का महापर्व कहा गया है. कार्तिक मास में मनाया जानेवाला यह पर्व चार दिनों तक उल्लास पूर्वक मनाया जाता है़. चार दिनों तक व्रती कठिन तपस्या के द्वारा अपने परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते है.शक्ति व ऊर्जा के साक्षात प्रतीक सूर्य की आराधना का यह पर्व है़. यह लोक आस्था का पर्व है़. इस पर्व की विशेषता यह है की उगते सूरज ही नहीं डूबते हुए सूरज को भी उतनी ही श्रद्धा के साथ पूजा जाता है,क्योंकि सूरज तो सूरज है चाहे कुछ अंतराल के लिए डूब ही क्यों न जाये़ डूबने के बाद उगने की शाश्वत सत्यता को देखकर यह ज्ञान देने का प्रयत्न करता है की डूबना अंत नहीं है़ डूबना और उगना निरंतर चलने वाली अंतहीन प्रक्रिया है़.इससे सामाजिक संदेश मिलता है.की डूबते हुए का निरादर नहीं करना चाहिए.उसे भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना उगते हुए को.यह महापर्व अमीरी-गरीबी का भेदभाव मिटाकर हमें समानता का पाठ पढ़ाता है़.

पहला दिन,नहाय-खाय

छठ पर्व के प्रथम दिन शनिवार को अर्थात कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को व्रती पवित्र सरोवर,तालाब अथवा घर में स्नान कर साथ ही अरवा चावल का भात, कद्दू की सब्जी व चने की दाल आदि सात्विक भोजन किया और छठ की शुरुआत हो गयी.

दूसरा दिन,खरना

खरना छठ पर्व के दूसरे दिन यानी रविवार को अर्थात पंचमी तिथि को पूरे दिन निर्जला व्रत रहने के बाद संध्या समय सूर्य पूजन अर्थात छठ व्रत को करने का संकल्प लेंगे.साथ ही रात्रि में पूरे परिवार के भोजन उपरांत व्रती नमक रहित भोजन व फल आदि ग्रहण करेंगे.

तीसरा दिन,संध्या अर्घ्य

अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य पर्व के तीसरे दिन सोमवार को अर्थात षष्ठी को दिन भर उपवास रहकर व्रती दोपहर से ही नहर, तालाब,नदी आदि घाटों पर पहुंचेंगे और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे.

अंतिम दिन,प्रातः अर्घ्य

उदीयमान सूर्य को अर्घ्य छठ के चौथे दिन मंगलवार को अर्थात सप्तमी को छठ व्रती उदीयमान भगवान भाष्कर को व्रती अर्घ्य देंगे.तदोपरांत पारण करेंगे.इस प्रकार चार दिवसीय छठ पर्व का अनुष्ठान संपन्न होगा.आज से शुरू होगा

36 घंटे का निर्जला व्रत

छठ गीतों से भाव-विभोर हुए लोग* लोक आस्था के इस पर्व को लेकर दीपावली के समय से पूरा वातावरण छठ गीतों से गूंजना शुरु हो जाता है छठ के पारंपरिक गीत गूंजने लगते हैं.जो पूरे छठ पर्व तक गूंजते हैं खासकर स्वर्गीय शारदा सिन्हा के कर्ण प्रिय गीतों से लोग भाव-विभोर हो रहें है.

वर्ष में होता है दो बार छठ

साल में दो बार छठ होता है-कार्तिकी छठ और चैती छठ कार्तिकी छठ सभी क्षेत्रों में प्रसिद्ध है.इसलिए इस छठ को करने वालों की संख्या अधिक है.इस पर्व में ऊंच-नीच,अमीर-गरीब का भेदभाव समाप्त हो जाता है. आर्थिक रूप से कमजोर श्रद्धालु सूप में भीख मांगकर इस पर्व को करते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AWADHESH KUMAR

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AWADHESH KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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