नहाय-खाय के साथ चार दिवसीय महापर्व छठ आज से

लोक आस्था, शुद्धता, संस्कृति एवम प्रकृति के संरक्षण का अनूठा संदेश देने वाला चार दिवसीय छठ महापर्व आज से नहाय खाय अनुष्ठान के साथ ही बड़े धूमधाम से आरंभ हो होगा.
पौआखाली.लोक आस्था, शुद्धता, संस्कृति एवम प्रकृति के संरक्षण का अनूठा संदेश देने वाला चार दिवसीय छठ महापर्व आज से नहाय खाय अनुष्ठान के साथ ही बड़े धूमधाम से आरंभ हो होगा. आज सुबह छठ व्रति ने सूर्योदय के समय नदियों में स्नान कर सूर्यदेव को जल अर्पित करने के बाद घर लौटकर कद्दू भात बनाने की तैयारियों में जुट जायेंगे. वहीं छठ महापर्व को लेकर भक्तिभाव का वातावरण छाने लगा है. हाट बाजारों में भी छठ पूजा की रौनक अब परवान चढ़ने लगी है. छठ के मनमोहक मधुर लोकगीतों की ध्वनि से रोम रोम में आस्था और श्रद्धा का भाव समाने लगा है. आज से लेकर 28 अक्तूबर तक नहाय खाय, खरना प्रसाद, संध्या अर्घ्य और प्रातःकालीन अर्घ्य तक इस महापर्व का सिलसिला चलता रहेगा. इधर जिले के पौआखाली नगर के प्रसिद्ध पबना छ्ठघाट समेत अन्य घाटों में टेंट आदि लगाने का कार्य प्रगति पर है.
आस्था श्रद्धा एवं शुद्धता का प्रतीक है छठ महापर्व
छठ के त्योहार को लोक आस्था का महापर्व यूं ही नही कहा जाता है, छठ महापर्व आस्था श्रद्धा के साथ ही शुद्धता का सबसे बड़ा प्रतीक पर्व है. नया खाय के दिन से पहले ही घर आंगन की बढ़िया से साफ सफाई और निपाई- पोताई कर ली जाती है. भोजन से लेकर प्रसाद बनाने तक शुद्धता का सबसे ज्यादा ख्याल रखा जाता है. यहां तक कि दिवाली के बाद से ही लोग तामसिक भोजन का त्याग कर देते है. इस पर्व में मिट्टी के नए चूल्हे बनाकर खरना प्रसाद तैयार किया जाता है जिसे संध्या बेला में ग्रहण कर महिलाएं 36 घंटे का निर्जला उपवास रखती है जिसका पारन सीधे प्रातःकालीन अर्घ्य के बाद ही किया जाता है.प्रकृति संरक्षण का अनूठा संदेशवाहक है छठ महापर्व
छठ, प्रकृति संरक्षण को अभिव्यक्त करता एक ऐसा अनूठा महापर्व है जिसमें जल, मिट्टी, अग्नि, वायु और आकाश जो पर्यावरण को सींचते हैं और इनके महत्वपूर्ण कारक भी हैं उसकी उपासना की जाती है सूर्यदेव की आराधना कर जीवन में ऊर्जा सुख समृद्धि की कामना की जाती है यानि कि इस महापर्व के बहाने प्रकृति की पूजा की जाती है ताकि हमारी यह प्रकृति सदा सदा के लिए सुरक्षित एवम संरक्षित रहें. इस समय प्राप्त होने वाले मौसमी फल जैसे नारियल, नींबू, केला, गन्ना, सिंघाड़ा, सेब आदि का सिर्फ प्रसाद के तौर पे धार्मिक महत्व ही नही है बल्कि ये प्राकृतिक औषधियों के रूप में स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद स्रोत भी है.डूबते सूर्य का भी होता है सम्मान
इस महापर्व की सबसे बड़ी खासियत है कि उगते सूर्य को तो सभी नमन करते हैं किंतु डूबते को नही. और यही एकमात्र पर्व है जिसमें डूबते सूर्य को भी छठव्रती एवम समस्त श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ अर्घ्य अर्पित और नमन कर प्रार्थना करते हैं कि हे भगवन आप पुनः एक नई ऊर्जा एक नई किरण के साथ उदयीमान होकर संपूर्ण धरा के प्राणियों का कल्याण करें. दरअसल यही परंपरा और संस्कृति इस महापर्व को खास बनाती है.
ठेकुआ प्रसाद के बिना अधूरा है छठ महापर्व
छठ महापर्व का नाम जुबां पे आते ही ठेकुआ प्रसाद की मिठास मन में घुलने लगती है. दरअसल ठेकुआ एक पारंपरिक मिठाई है जो गेंहू के आटे घी और गुड़ से तैयार किए जाते हैं. इसकी महत्ता इतनी है कि भगवान सूर्य को भोग लगाने के बाद ही छठ पूजा को पूर्ण माना जाता है, इनसे भोग बिना छठ महापर्व अधूरा माना गया है. ठेकुआ प्रसाद के रूप में घर घर बांटने की परंपरा पीढ़ियों से रही है इसकी मिठास और स्वाद सामाजिक एकता को भी बढ़ावा देती है.
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