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गर्भावस्था के दौरान 80 प्रतिशत महिलाओं को रहता है एनीमिया का खतरा

Updated at : 04 Nov 2025 8:00 PM (IST)
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गर्भावस्था के दौरान 80 प्रतिशत महिलाओं को रहता है एनीमिया का खतरा

एक स्वस्थ गर्भावस्था केवल एक मां की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की खुशहाली की नींव होती है. लेकिन इसी गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को सबसे बड़ा खतरा जिस बीमारी से होता है, वह है एनीमिया (रक्त की कमी).

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स्वस्थ मां, स्वस्थ शिशु: एनीमिया नियंत्रण के लिए सजग हुआ स्वास्थ्य विभाग किशनगंज.एक स्वस्थ गर्भावस्था केवल एक मां की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की खुशहाली की नींव होती है. लेकिन इसी गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को सबसे बड़ा खतरा जिस बीमारी से होता है, वह है एनीमिया (रक्त की कमी). यह ऐसी स्थिति है जो न केवल मां के जीवन के लिए जोखिमपूर्ण है, बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि एनीमिया गर्भवती महिलाओं में मातृ मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण बन सकती है.

क्या है एनीमिया और क्यों है यह चिंताजनक?

हीमोग्लोबिन हमारे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने वाला प्रमुख प्रोटीन है. इसकी कमी को ही एनीमिया कहा जाता है. सामान्य रूप से पुरुषों में हीमोग्लोबिन का स्तर 13.5 से 17.5 ग्राम व डीएल और महिलाओं में 12 से 15.5 ग्राम व डीएल के बीच होना चाहिए. जब यह स्तर कम हो जाता है, तो शरीर में कमजोरी, चक्कर आना, बाल झड़ना, थकावट और डिप्रेशन जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं.महिला चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. शबनम यास्मीन बताती हैं कि गर्भावस्था के दौरान लगभग 80 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी रूप में एनीमिया की चपेट में आ जाती हैं. यह स्थिति प्रसव के समय जटिलता बढ़ा सकती है और गर्भस्थ शिशु के शारीरिक एवं मानसिक विकास पर प्रतिकूल असर डालती है. यदि हीमोग्लोबिन 7 ग्राम व डीएल से नीचे पहुंच जाए, तो स्थिति जानलेवा भी हो सकती है.

एनीमिया मुक्त भारत अभियान: महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच

एनीमिया की भयावहता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने इस दिशा में सशक्त कदम उठाए हैं. सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी के अनुसार जिले में एनीमिया नियंत्रण के लिए ‘एनीमिया मुक्त भारत अभियान’ के तहत व्यापक गतिविधियां चल रही हैं.आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर महिलाओं और किशोरियों को आयरन फोलिक एसिड ) की गोलियां वितरित कर रही हैं. विद्यालयों में भी बच्चों को उम्र के अनुसार आईफा की खुराक दी जा रही है.

एचएससी स्तर पर आयोजित बैठक में हुई समीक्षा

जिले के विभिन्न हेल्थ सब-सेंटर पर एनीमिया नियंत्रण को लेकर बैठकें और अभिसंवाद आयोजित किए गए. इसमें आशा, एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को गर्भवती महिलाओं के फॉलोअप, हीमोग्लोबिन जांच और सप्लीमेंट वितरण के प्रति और अधिक सक्रिय रहने का निर्देश दिया गया.बैठक में स्वास्थ्यकर्मियों ने क्षेत्रवार उपलब्धि और चुनौतियों पर चर्चा की. विशेष रूप से किशनगंज, दिघलबैंक, टेढ़ागाछ और ठाकुरगंज ब्लॉक के आंकड़ों की समीक्षा की गई.

पोषण और परामर्श से बनाएं जीवन स्वस्थ

सिविल सर्जन डॉ. चौधरी ने कहा किएनीमिया का मूल कारण खानपान में पोषण की कमी है. इसका समाधान जागरूकता और संतुलित आहार से संभव है.उन्होंने बताया कि नियमित रूप से हरी पत्तेदार सब्जियां, चुकंदर, अनार, अमरूद, केला, गाजर, टमाटर, बादाम, किशमिश, खजूर, अंडा, मछली, चिकन और गुड़ का सेवन करने से हीमोग्लोबिन का स्तर बनाए रखा जा सकता है.उन्होंने यह भी सलाह दी कि गर्भवती महिलाएं किसी भी प्रकार की थकावट, चक्कर आना, या सांस फूलने जैसे लक्षण महसूस करें, तो तुरंत नजदीकी सरकारी अस्पताल में जांच कराएं और चिकित्सक की सलाह पर दवा लें.

जागरूकता ही सबसे बड़ी सुरक्षा

सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ अनवर हुसैन ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान एनीमिया एक गंभीर स्वास्थ्य संकट है, लेकिन समय पर जांच, पोषणयुक्त आहार और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर इसे पूरी तरह रोका जा सकता है. उन्होंने आगे कहा कि एनीमिया से निपटने के लिए जरूरी है कि हर महिला अपनी सेहत के प्रति सजग रहे और विभागीय कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी करे.उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग की पहल, जनसहभागिता और जागरूकता ही एनीमिया मुक्त भारत की नींव हैं, क्योंकि एक स्वस्थ मां ही एक स्वस्थ पीढ़ी की जननी होती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AWADHESH KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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