पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है छठ का महाव्रत

Published at :24 Oct 2017 5:24 AM (IST)
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पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है छठ का महाव्रत

दिघलबैंक : साक्षात प्रकृति के आराधना का चार दिवसीय अनुष्ठान छठ पूजा की शुरुआत आज मंगलवार को नहाय-खाय के साथ ही प्रारंभ हो जायेगा. जिसको लेकर पर्व की तैयारियां अंतिम चरण में है. कार्तिक माह में मनाये जाने वाला लोक आस्था का महापर्व छठ का हिन्दू धर्म में एक विशेष और अलग स्थान है,कहा जाता […]

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दिघलबैंक : साक्षात प्रकृति के आराधना का चार दिवसीय अनुष्ठान छठ पूजा की शुरुआत आज मंगलवार को नहाय-खाय के साथ ही प्रारंभ हो जायेगा. जिसको लेकर पर्व की तैयारियां अंतिम चरण में है. कार्तिक माह में मनाये जाने वाला लोक आस्था का महापर्व छठ का हिन्दू धर्म में एक विशेष और अलग स्थान है,कहा जाता है कि इस पर्व में प्रकृति की साक्षात पूजा होती है. शुद्धता एवं पवित्रता इस पर्व का मुख्य अंग है, प्रकृति के अवयवों में से एक जल स्रोतों के निकट छठ पूजा का आयोजन होता है

. व्रती द्वारा पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिए जाते हैं. इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि संभवतः ये अपने आप में ऐसा पहला पर्व है जिसमें कि डूबते और उगते दोनों ही सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है . उनकी वंदना की जाती है. सांझ-सुबह की इन दोनों अर्घ्य के पीछे हमारे समाज में एक आस्था का काम करती है. वो आस्था ये है कि सूर्यदेव की दो पत्नियां हैं- ऊषा और प्रत्युषा . सूर्य के भोर की किरण ऊषा होती है और सांझ की प्रत्युषा .

अतः सांझ-सुबह दोनों समय अर्घ्य देने का उद्देश्य सूर्य की इन दोनों पत्नियों की अर्चना-वंदना होती है. दिखावा और आडम्बर से अलग हटकर इस पर्व का आयोजन ही इसका विशेष पक्ष है. 48 घंटे के लंबे उपवास के दौरान पानी में खड़े होकर सूर्य देवता की अराधना की जाती है . अस्ताचलगामी (डूबते)सूर्य को और उदीयमान(उगते)सूर्य को अर्घ्य देने के उपरांत ही इस महाअनुष्ठान का समापन होता है. आधुनिकता से अलग छठ पर्व में मिट्टी और कृषि उत्पादनों का शुरू से लेकर अंत तक इस्तेमाल होता है . मिट्टी के चूल्हों पर खरना का प्रसाद तथा पकवान, बांस से निर्मित डाला को सजाकर ही छठ व्रती अपने परिवार के साथ घाटों की और प्रस्थान करते हैं . जबकि पूजा सामग्री में भी पानी सिंघाड़ा, ईख, हल्दी, नारियल, नींबू के अलावे मौसमी फल और गाय के दूध की अनिवार्यता होती है. बदलते समय और आधुनिकता से छठ पर्व पर कोई असर नहीं हुआ है. घर से बाहर नदी और तलाब के निकट मनाये जाने से एक सामाजिक वातावरण का माहौल भी स्थापित होता है. छठ के मौके पर प्रदेश और विदेश में रहने वाले भी गांव और घर लौटते हैं तथा छठ घाटों पर सभी से भेंट मुलाकात भी होती है.
प्रकृति के काफी नजदीक है लोक आस्था का यह महापर्व पूजन में प्रयोग की जाने वाली सामग्री प्रकृति के अनुकूल और समाज को जोड़ने वाली होती है. छठ पर्व सूर्य की ऊर्जा की महत्ता के साथ जल और जीवन के संवेदनशील रिश्ते को पुष्ट करता है. इस महापर्व में प्रकृति की संवेदना का खास ख्याल रखा जाता है
छठ पर्व के दौरान अस्ताचलगामी भगवान भाष्कर को अ‌र्घ्य देने के बाद पुन: अगले दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ समाप्त होता है. लोक आस्था के यह महापर्व न सिर्फ भक्तों में आस्था का प्रतीक है बल्कि यह पावन पर्व प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण के साथ हमारी संस्कृति से सीधे तौर पर जोड़ने का कार्य करता है. यह ही एक ऐसा पर्व है जिसमें न तो किसी पंडित की आवश्यकता पड़ती है और ना ही मंत्रों का उच्चारण होता है. पूजा के दौरान महिलाएं अपने गीतों के माध्यम से भगवान भाष्कर और छठी माइया के कृत्यों का बखान करती हैं. गीत गाने की यह परंपरा सीधे तौर पर हमारी संस्कृति और सभ्यता की पहचान है.
24 अक्टूबर- नहाय खाय
25 अक्टूबर – खरना
26 अक्टूबर गुरुवार को पहला अर्घ्य.इसमें व्रती द्वारा अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य दिया जायेगा. नदी घाटों पर श्रद्धा का सैलाब उमड़ेगा.
27 नम्बर शुक्रवार को उदीयमान सूर्य को अर्ध्य के साथ महापर्व का समापन होगा.
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