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संशोधित: महापर्व को ले गंगा में हजारों श्रद्धालुओं ने लगायी डुबकी

Updated at : 24 Oct 2025 8:21 PM (IST)
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संशोधित:  महापर्व को ले गंगा में हजारों श्रद्धालुओं ने लगायी डुबकी

लोक आस्था का महापर्व छठ आज से प्रारंभ हो गया

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परबत्ता. लोक आस्था का महापर्व छठ आज से प्रारंभ हो गया. चार दिवसीय महापर्व की शुरुआत से पहले हजारों श्रद्धालुओं ने अगुवानी, बन्नी, मानसी गंगा घाट पर मां गंगा की पवित्र धारा में डूबकी लगायी. शुक्रवार को अलग-अलग इलाके के व्रती वाहनों से गंगा घाट पर पहुंची. सुबह चार बजे से गंगा घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. बताया जाता है कि छठ व्रती गंगा या तालाब में नहा-धोकर प्रसाद बनाती है. शनिवार को नहाय खाय होगा. इस दिन खाने में कद्दू, दाल और अरवा चावल का उपयोग करते हैं. चार दिवसीय पर्व को लेकर माहौल भक्ति मय होने लगा है. अटूट आस्था के साथ व्रती तैयारी में जुट गये हैं. बाजारों में भीड़ उमड़ पड़ी है. ग्रामीण स्तर पर इसकी तैयारियों जोरों पर है. खास करके साफ-सफाई पर पैनी नजर लोगों की रहती है. छठ को लेकर बाजारों में फल से दुकानें सजी हुए है. आज नहाय खाय को लेकर गंगा तट पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. अगुवानी गंगा घाट एवं नयागांव सीढ़ी गंगा घाट पर भीड़ उमड़ने लगी है. छठ व्रती श्रद्धा भक्ति के साथ गंगा में डुबकी लगा रहे हैं. घर-घर तैयारियां जोरों पर हैं. बाजारों में सड़क के किनारे दुकानदार नारियल, टाभ, सेब, नारंगी, मौसमी, सिंघाड़ा, पनीयाला, हल्दी, आदरख, मूली, ईख, आरत, सुथनी, पंचमेवा, सुपारी आदि सजा कर रख दिए हैं. वहीं दुकानदार ने बताया कि नारियल 120 रुपये जोड़ा, सेब 80 से 100 रुपये किलो, नारंगी 60 से अस्सी रुपये किलो, सूप 60 से 80 रुपये, ईख 10 रुपये, टाभ 10 से 15, कद्दू 50 से 80 रुपये पीस हैं.

सादगी एवं पवित्रता का अनुपम छटा

छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है. भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है. शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है. इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है. इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की. जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञता पूर्वक प्रस्तुत रहता है. इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है. नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था की जा रही है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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