जिउतिया अनुष्ठान शुरू आस्था. शुक्रवार को अहले सुबह खायेंगे अठकोनमा
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :23 Sep 2016 5:39 AM (IST)
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दो दिवसीय जिउतिया पर्व गुरुवार को नहान खाय के साथ शुरू हो गया. यह व्रत संतान की मंगलकामना के लिए किया जाता है़ यह व्रत माताएं रखती है़ं खगड़िया/गोगरी : हमारे देश में भक्ति एवं उपासना का एक रूप उपवास है, जो मनुष्य में संयम, त्याग, प्रेम व श्रद्धा की भावना को बढ़ाते हैं. उन्हीं […]
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दो दिवसीय जिउतिया पर्व गुरुवार को नहान खाय के साथ शुरू हो गया. यह व्रत संतान की मंगलकामना के लिए किया जाता है़ यह व्रत माताएं रखती है़ं
खगड़िया/गोगरी : हमारे देश में भक्ति एवं उपासना का एक रूप उपवास है, जो मनुष्य में संयम, त्याग, प्रेम व श्रद्धा की भावना को बढ़ाते हैं. उन्हीं में से एक है जिवित्पुत्रिका व्रत़ जिसे जिउतिया या जितिया भी कहते हैं. यह व्रत संतान की मंगलकामना के लिए किया जाता है़ यह व्रत माताएं रखती है़ं जिउतिया व्रत निर्जला किया जाता है़ जिसमें पूरा दिन एवं रात पानी नहीं लिया जाता़ इसे तीन दिन तक मनाया जाता है़ संतान की सुरक्षा के लिए यह व्रत किया जाता है़ पौराणिक समय से इसकी प्रथा चली आ रही है़
पूजा की विधि : यह व्रत दो दिन किया जाता है़ दोनों दिन व्रत की विधि अलग-अलग होती है़ नहाय खाय से व्रत की शुरुआत होती है़ गुरुवार को नहाय खाय है़ इस दिन से व्रत शुरू होता है़ महिलाएं नहाने के बाद एक बार भोजन लेती है़ जिउतिया व्रत के दूसरे दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती है़ इसी दिन अहले सुबह अठकोनमा खाया जाता है़ यह दिन विशेष होता है़ व्रत के दूसरे दिन पारण होता है़ लेकिन खास तौर पर इस दिन झोर भात, नोनी का साग एवं मड़ुआ की रोटी अवश्य खाते हैं
जिउतिया व्रत की एक पौराणिक कथा : प्राचीनकाल में जीमूतवाहन नामक एक राजा था . वह बहुत धर्मात्मा, परोपकारी, दयालु, न्यायप्रिय तथा प्रजा को पुत्र की भांति प्यार करने वाला था़ एक बार शिकार करने के लिए मलयगिरि पर्वत पर गए़ वहां उनकी भेंट मलयगिरि की राजकुमारी मलयवती के हो गई,जो वहां पूजा करने के लिए सखियों के साथ आई थी़ दोनों एक दूसरे को पसंद आ गए़ वहीं पर मलयवती का भाई भी आया हुआ था़ मलयवती का पिता बहुत दिनों से जीमूतवाहन से अपनी बेटी का विवाह करने की चिन्ता में था़ अत: जब मलयवती के भाई को पता चला कि जीमूतवाहन और मलयवती एक दूसरे को चाहते हैं,
तो वह बहुत खुश हुआ, और अपने पिता को यह शुभ समाचार देने के लिए चला गया़ इधर मलयगिरि की चोटियों पर घूमते हुए राजा जीमूतवाहन ने दूर से किसी औरत के रोने की आवाज सुनी़ उनका दयालु हृदय विह्वल हो उठा़ वह उस औरत के समीप पहुंचे़ उससे पूछने पर पता चला कि पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार उसके एकलौते पुत्र शंखचूर्ण को आज गरुड़ के आहार के लिए जाना पड़ेगा़ नागों के साथ गरुड़ का जो समझौता हुआ था उसके अनुसार मलयगिरि के शिखर पर रोज एक नाग उनके आहार के लिए पहुंच जाया करता था़ शंखचूर्ण की माता की यह विपत्ति सुनकर जीमूतवाहन का हृदय सहानुभूति और करुणा से भर गया,
क्योंकि शंखचूर्ण ही उसके बुढ़ापे का एक मात्र सहारा था़ जीमूतवाहन ने शंखचूर्ण की माता को आश्वासन दिया कि माता आप चिंता न करें मैं स्वयं आपके बेटे के स्थान पर गरुड़ का आहार बनने को तैयार हूं. ज़ीमूतवाहन ने यह कहकर शंखचूर्ण के हाथ से उस अवसर के लिए निर्दिष्ट लाल वस्त्र को लेकर पहन लिया और उसकी माता को प्रणाम कर विदाई की आज्ञा मांगी़ नाग देवता आश्चर्य में डूब गये उसका हृदय करुणा से और भी बोझिल हो उठा. उसने जीमूतवाहन को रोकने की कोशिश की,
किन्तु वह कहां रूक सकता था़ उसने तुरंत गरुड़ के आहार के लिए नियत पर्वत शिखर का मार्ग पकड़ा और माa-बेटे आश्चर्य से उसे जाते हुए देखते रह गये उधर समय पर गरुड़ जब अपने भोजन-शिखर पर आया और बड़ी प्रसन्नता से इधर-उधर देखते हुए अपने भोजन पर चोंच लगाई तो उसकी प्रतिध्वनि से संपूर्ण शिखर गूंज उठा़ जीमूतवाहन के अंगों पर पड़कर उसकी चोंच को भी बड़ा धक्का लगा. यह भीषण स्वर उसी धक्के से उत्पन्न हुआ था. गरुड़ का सिर चकराने लगा.
थोड़ी देर बाद जब गरुड़ को थोड़ा होश आया तब उसने पूछा- आप कौन हैं. मैं आपका परिचय पाने के लिए बेचौन हो रहा हूं . जीमूतवाहन अपने वस्त्रों में उसी प्रकार लिपटे हुए बोले, पक्षिराज मैं राजा जीमूतवाहन हूँ, नाग की माता का दुख मुझसे देखा नहीं गया.
खरीददारी को लेकर बाजार में बढ़ी लोगों की भीड़. फोटो। प्रभात खबर
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