तटबंध भी अधूरा, कुशेश्वर रेल परियोजना का भी काम नहीं हुआ पूरा
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 02 Jul 2018 2:35 AM
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प्रवीण कुमार अटल खगड़िया : जिले में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं भू-अर्जन की पेंच में फंस कर रह गई है. भू-अर्जन की पेंच के कारण न ही खगड़िया शहर व आस-पास के दर्जनों पंचायत बाढ़ के पानी से सुरक्षित हुआ और न ही 18 साल बाद भी खगड़िया जंक्शन से कुशेश्वर स्थान के बीच सीधी रेल […]
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प्रवीण कुमार अटल
खगड़िया : जिले में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं भू-अर्जन की पेंच में फंस कर रह गई है. भू-अर्जन की पेंच के कारण न ही खगड़िया शहर व आस-पास के दर्जनों पंचायत बाढ़ के पानी से सुरक्षित हुआ और न ही 18 साल बाद भी खगड़िया जंक्शन से कुशेश्वर स्थान के बीच सीधी रेल सेवा बहाल हो सकी.
इतना ही नहीं भू अर्जन के पेंच के कारण आरओबी के एप्रोच सड़क का चौड़ीकरण तथा पुल बन जाने के एक साल बाद भी सोनमनखी पुल के एप्रोच सड़क के लिए जमीन का अधिग्रहण कार्य पूरा नहीं हो पाया. ऐसे कुछ छोटे परियोजनाएं है जो भू-अर्जन की जटिल पेंच में उलझ कर रह गयी है.
करोड़ों खर्च के बाद भी बाढ़ का खतरा बरकरार
नगर सुरक्षा तटबंध के निर्माण/उंचीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये गये. लेकिन अब भी बाढ़ का खतरा शहर व इसके आस-पास के दर्जनो गांव के लाखों लोगों के सर पे मंडरा रही है.
स्थिति यह है कि शहर सहित दर्जनों गांवों को बाढ़ के पानी से बचाने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये गये. फिर भी शहर पानी के सैलाब से आज भी असुरक्षित है. अगर खगड़िया से लेकर दरभंगा जिले तक कहीं भी नदी का तटबंध टूटा तो शहर की सड़कों पर गाड़ियां नहीं बल्कि नाव चलेगी. जैसा कि वर्ष 2000, 2002 एवं 2007 में आयी बाढ़ के दौरान देखने को मिला था. जानकार बताते हैं कि वर्ष 1987 के बाढ़ के दौरान भी यही हुआ था.
भू-अर्जन का है पेच : भू-अर्जन की पेंच के कारण शहर के लाखों लोगों की सुरक्षा फंसी हुयी है. अगर तटबंध निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण का कार्य पूर्ण हो गया होता तो काफी पहले तटबंध भी बन गए होते. बभनगामा मौजा में इसलिए तटबंध नहीं बन पाया क्योंकि यहां कार्य आरंभ करने के पूर्व जमीन का अधिग्रहण नहीं किया और न ही किसानों को मुआवजा दिया गया.
सूत्र बताते है कि मुआवजा नहीं मिलने से नाराज लोगों ने वर्ष 11-12 में ही काम रोक दिया. हालांकि उसके बाद भू-अर्जन की प्रक्रिया तो हुई लेकिन रफ्तार कछुए से भी धीमी रही. जिस कारण अब तक यह काम पूरा नहीं हो पाया. बताया जाता है कि जमीन भू-अर्जन का काम भागलपुर कार्यालय से हो रहा है. उम्मीद है कि साल के अंत तक जमीन भू-अर्जन का काम पूरा हो जायेगा. जिसके बाद निर्माण कार्य भी शुरू हो जायेगा. यानि इस साल बाढ़ के साए में लोगों को दिन गुजारने होंगे.
प्रलय झेल चुके हैं शहरवासी : बीते दो दशक के दौरान यानी 1987 से 2007 के बीच चार बार बाढ़ के कारण शहर की सड़कों पर नावें चली थी. स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तारों, अस्पताल में पानी प्रवेश कर गया था. कई महत्वपूर्ण फाईल नष्ट हुयी थी.
रेलवे लाइन के उत्तरी भाग अवस्थित लगभग सभी घरों में बाढ़ का पानी घुसा था. इन चार साल के बाद बाढ ने काफी नुकसान पहुंचाया था. बार बार आ रही बाढ़ से निजात दिलाने के लिए वर्ष 2007 के बाढ़ नगर सुरक्षा तटबंध बनाने का निर्णय लिया गया. ताकि शहर के साथ साथ खगड़िया के कई पंचायत एवं अलौली के कई गांवों को बाढ़ के पानी से सुरक्षित किया जाये.
अधूरी रह गयी योजना : ऐसा नहीं है कि नगर सुरक्षा तटबंध का निर्माण कार्य आरंभ नहीं हुआ. करीब सात साल पहले यानी वर्ष 2009-10 में तटबंध का निर्माण कार्य आरंभ हुआ.
लेकिन सात साल बाद भी कार्य पूरा नहीं हो पाया. जबकि नगर सुरक्षा तटबंध को दो साल में ही पूरा कराने का लक्ष्य था. जानकार बताते है कि जितना निर्माण हुआ है. उससे 6 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुका है. लेकिन निर्माण कार्य अधूरी रहने के कारण पानी से बचाव के लिए बनी योजना पर ही पानी फिर गया.
28.4 किमी लंबा बनना था तटबंध
विभागीय जानकारी के मुताबिक बेगूसराय जिले के बगरस स्लुइस गेट से अलौली प्रखंड के संतोष पुल तक करीब 28.4 किमी चनहा नदी पर तटबंध बनना था. चनहा नदी के दक्षिणी भाग पर ऊंचा व चौड़ा तटबंध का निर्माण कराया जाना था.
ताकि बाढ़ के पानी को इधर आने से रोका जा सके. तटबंध का निर्माण पूरा हो जाने के बाद बखरी अनुमंडल के कई पंचायतों के साथ साथ सदर प्रखंड के एक दर्जन से अधिक पंचायत, अलौली के कई गांव सहित मानसी प्रखंड के गांव भी बाढ़ के पानी से सुरक्षित हो जायेंगे. कभी बगरस से खगड़िया के बीच बुढ़ि गंडक का उत्तरी तटबंध टूटेगा तभी इन क्षेत्रों में पानी प्रवेश कर पायेगा.
काम अधर में, 400 करोड़ का नुकसान भी
18 वर्षों के बाद भी कुशेश्वर रेल परियोजना अधूरा पड़ा हुआ है. इस क्षेत्र के लाखों लोगों के रेल की यात्रा करने के अरमान तो पूरे हुए नहीं,उल्टे रेलवे को 4 सौ करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा. कुशेश्वर रेल परियोजना समय पर पूरा नहीं होने के कारण रेलवे को करोड़ों का नुकसान हुआ है. नुकसान रेलवे को ही नहीं इस क्षेत्र के लाखों की आबादी को भी हुआ है.
जो नये भारत में भी बेहतर यातायात की सुविधा से अब तक महरूम होकर रह गए हैं. पहले बात रेलवे को हुये नुकसान की जानकारी के मुताबिक इस महत्वपूर्ण रेल परियोजना का काम विगत 15 वर्षों से चलता आ रहा है. कहने को परियोजना का कार्य 15 वर्ष से चल रहा है. लेकिन कुछ पेंच के कारण काम लगातार नहीं हुये है. अलग अलग कारणों से काफी समय तक कार्य रूके रहे हैं.
जानकार काम रूकने का मुख वजह भू-अर्जन की पेंच एवं आवंटन की कमी बता रहे है. बात भी सही है, लेकिन इस परियोजना के पूरे होने में लगे विलंब के कारण रेलवे को 403 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. जब कुशेश्वर रेल परियोजना की स्वीकृति मिली थी. तब इस कार्य को पूरा कराने के लिए 162 करोड़ रुपये का बजट तैयार किया गया था. लेकिन समय पर काम पूरा नहीं होने की वजह से अब लागत 162 करोड़ से बढ़कर 565 करोड़ रुपये का हो गया है. लेकिन निर्माण की गति व अब तक की उपलब्धि जो रही है वो निराश करने वाली है.
जानकारी के मुताबिक वर्ष 1996 में खगड़िया व दरभंगा जिले के कुशेश्वर स्थान को रेलवे से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार से स्वीकृति मिली थी. लेकिन काम करीब सात साल बाद यानी 2003 में आरंभ हुआ था. जब कुशेश्वर स्थान रेल परियोजना की मंजूरी दी गयी थी तब वर्ष 2006 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन स्वीकृति के इतने वर्ष बाद भी इस रेल परियोजना का कार्य अधूरा पड़ा हुआ है.
अबर कार्य के बात की जाए तो 25 प्रतिशत से भी कम भाग में रेल पटरी बिछाई जा सकी है.अब इस रेल परियोजना को वर्ष 2020 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है जो कि फिलहाल यह काम मुश्किल दिख रहा है. फिलहाल एक स्टेशन तक का काम पूरा हुआ है अब भी कुशेश्वर स्थान स्टेशन तक कई जगहों पर पुल पुलिये का निर्माण कराना बांकी है.
कार्य पूरा करने के लिए लाईन बिछाने के साथ साथ 54 जगहों पर छोटे पुलिया तथा 9 जगहों पर बड़े पुल का निर्माण कराया जाना बांकी है. सूत्र बताते हैं कि शहरबन्नी मौजा में भू-अर्जन का भी पेंच फंसा हुआ है. तथा कार्य में तेजी लाने के लिए भारी भरकम आवंटन की भी जरूरी है. अगर इतने कार्य तेजी गति से हुये तभी वर्ष 2020 तक इस परियोजना का कार्य पूरा हो सकेगा. अन्यथा रेलवे की यात्रा करने के लिए इस सुदूर क्षेत्र के लाखों की आबादी को ओर कई वर्ष इंतजार करना पड़ेगा.
परियोजना पर ग्रहण
बभनगामा मौजा के करीब चार किमी तटबंध का निर्माण पूरा नहीं हो पाया है. जिस कारण इस महत्वपूर्ण परियोजना पर ग्रहण लगा हुआ है. बेगूसराय से संतोष पुल तक करीब 24 किमी लम्बे तटबंध का निर्माण काफी पहले कराया जा चुका है.
लेकिन बभनगामा मौजा में पड़ने वाले चार किमी हिस्से पर निर्माण अधूरा है. यहां करीब पांच वर्षों से काम रूका हुआ है. यहां काम इसलिए नहीं हो पाया है क्योंकि यहां के किसानों ने काम को रोक दिया था.अगर बाढ़ आई तो इसी रास्ते बाढ़ का पानी जिले में तबाही मचायेगा.
आरओबी का एप्रोच पथ भी अधिग्रहण के कारण प्रभावित
भू-अर्जन के कारण आरओबी के एप्रोच सड़क के चौड़ीकरण का कार्य भी अब तक आरंभ नहीं हो पाया है. जबकि पुल का निर्माण लगभग अंतिम चरण में है. बताया जाता है कि पहले अधियाची विभाग के द्वारा जमीन अधिग्रहण का अधियाचना विलंब से भेजने तथा अब राशि के अभाव में यह कार्य (अधिग्रहण) प्रभावित हुआ है.
वहीं करीब एक साल पूर्व सोनमखी पुल का निर्माण संपन्न हो गया है. लोग इस पुल का उपयोग भी कर रहें हैं. लेकिन सूत्र बतातें हैं कि इस पुल के एप्रोच सड़क के लिए जमीन का अधिग्रहण कार्य अब तक पूर्ण नहीं हो पाया है. भू-धारी को राशि तक नहीं दी गई है. जिस कारण वे कार्यालय के लगातार चक्कर लगा रहें हैं.
काम की स्थिति
जानकारी के मुताबिक खगड़िया के कुशेश्वर स्थानतक 42.6 किमी लंबी रेलखंड का निर्माण कराया जाना है. इन दोनों रेल जंक्शनों के बीच 8 रेल स्टेशनों का निर्माण होना है फिलहाल खगड़िया जंकशन से कामा स्थान तक रेलवे लाइन बिछा दी गयी है. कामास्थान से अलौली गढ़ स्टेशन के बीच रेलवे लाइन बिछाने के लिए मिट्टी भराई का कार्य चल रहा है.
42.6 किमी के विरूद्ध महज 8 से 10 किमी की दूरी तक ही रेल लाइन बिछाई गयी है. यानी वर्ष 2003 से अब तक मात्र 10 किमी ही लाइन बिछाई गयी है. जबकि करीब 32 किमी रेल पटरी बिछाना अब भी बांकी है.
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