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नशा मुक्ति केंद्र में स्मैक से नशा करने वाले को ला रहे परिजन

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कटिहार बिहार सरकार ने वर्ष 2016 में राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू किये जाने का उद्देश्य समाज को नशा मुक्त बनाना व शराब से होने वाले सामाजिक-पारिवारिक नुकसान को कम करना था. शराबबंदी के बाद शुरुआती दौर में इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले. लेकिन समय के साथ नशे का स्वरूप बदलता चला गया. शराब की जगह अब स्मैक जैसे खतरनाक नशे ने युवाओं के बीच तेजी से अपनी पकड़ बना ली है. जिले में स्मैक का अवैध कारोबार और इसका सेवन लगातार बढ़ रहा है. जो न केवल कानून-व्यवस्था बल्कि सामाज के लिए भी गंभीर चुनौती बन गया है. सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि स्मैक की चपेट में बड़ी संख्या में युवा और किशोर आ रहे हैं. जिससे उनका भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है. युवा पीढ़ी स्मैक जैसे नशा के इस दलदल में फंसता जा रहा है. नशा मुक्ति केंद्रों में स्मैक नशा के ज्यादा पहुंच रहे मरीज नशे से पीड़ित लोगों को इलाज, परामर्श व पुनर्वास की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने वर्ष 2016 में सदर अस्पताल में नशा मुक्ति केंद्र की स्थापना की थी. यह केंद्र पिछले 2016 से लगातार संचालित हो रहा है. यहां प्रतिदिन नशे के आदि मरीज पहुंच रहे हैं. हाल के महीनों में नशा मुक्ति केंद्र में दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार कुल 29 नशे के आदि मरीज इलाज के लिए नशा मुक्ति केंद्र पहुंचे. इनमें से 28 मरीज स्मैक के नशे के आदि पाए गये. जबकि केवल एक मरीज अन्य नशे से ग्रसित था. इन मरीजों में दो को छोड़कर शेष सभी युवा वर्ग से थे. जो यह स्पष्ट करता है कि स्मैक का नशा युवाओं में तेजी से फैल रहा है. नशे के मरीज हो तो रहे भर्ती लेकिन नहीं कर पाते पूरा कोर्स सदर अस्पताल में संचालित नशा मुक्ति केंद्र में इलाज के लिए नशा के आदि मनीष तक पहुंच जाते हैं. लेकिन नशे को छोड़ने के लिए वह पूरा कोर्स नहीं कर पाते हैं. पिछले महीना में नशा मुक्ति केंद्र में पहुंचे 29 मरीजों में से 10 ने भर्ती होकर नशा छोड़ने के लिए इलाज शुरू किया. सभी मरीजों ने स्वेच्छा से नशा छोड़ने की इच्छा जतायी. लेकिन इलाज की प्रक्रिया आसान नहीं रही. इनमें से सात मरीज इलाज का पूरा कोर्स पूरा किए बिना ही केंद्र से फरार हो गये. चिकित्सकों के अनुसार स्मैक अत्यंत खतरनाक और जानलेवा नशा है. जिसका असर शरीर और दिमाग दोनों पर पड़ता है. इसे छोड़ने के दौरान मरीजों को अत्यधिक बेचैनी, घबराहट, नींद न आना और मानसिक तनाव जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है. डॉक्टरों का कहना है कि स्मैक की लत छोड़ी जा सकती है. लेकिन इसके लिए समय, धैर्य और निरंतर चिकित्सकीय निगरानी जरूरी है. फिलहाल भर्ती मरीजों का उपचार विशेषज्ञों की निगरानी में जारी है. बढ़ती समस्या को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि स्मैक जैसे खतरनाक नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई, व्यापक सामाजिक जागरूकता अभियान और नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाने की सख्त जरूरत है. ताकि युवाओं को इस नशे के दलदल से समय रहते बाहर निकाला जा सके.

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