लाखों की दवा खरीद होने के बावजूद मरीज हो रहे परेशान

Updated at : 20 Sep 2019 8:11 AM (IST)
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लाखों की दवा खरीद होने के बावजूद मरीज हो रहे परेशान

कटिहार : गरीब मरीजों को स्वास्थ्य का लाभ बेहतर मिल सकें, इसको लेकर सरकार करोड़ों रुपये महीने का खर्च कर रही है. यह आंकड़ा सिर्फ अपना जिला का ही है. एक चिकित्सक की सैलरी एक से डेढ़ लाख रुपये हर महीने दी जाती है. जबकि जिलेभर मरीजों के लिए महीने में 25 से 30 लाख […]

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कटिहार : गरीब मरीजों को स्वास्थ्य का लाभ बेहतर मिल सकें, इसको लेकर सरकार करोड़ों रुपये महीने का खर्च कर रही है. यह आंकड़ा सिर्फ अपना जिला का ही है. एक चिकित्सक की सैलरी एक से डेढ़ लाख रुपये हर महीने दी जाती है.

जबकि जिलेभर मरीजों के लिए महीने में 25 से 30 लाख रुपये की सिर्फ दवाई की खरीदारी होती है. इसके बावजूद भी विडंबना कहें या स्वास्थ विभाग की उपेक्षा जिस कारण मरीजों को बेहतर इलाज नहीं हो पाता है. जितनी दवाई मरीजों को मिलनी चाहिए वह भी नहीं मिल पाता है. सदर अस्पताल में 71 किस्म की दवाई में 45 किस्म की दवाई ही फिलहाल मरीजों को मिल पा रही है. कुछ दिन पूर्व स्थिति और भी खराब थे. मात्र 27 किस्म की ही दवाई मरीजों को मिल पा रही थी.
जिस कारण ज्यादातर दवाई मरीज बाहर ही खरीदारी करते थे. यहां तक कि अस्पताल में एडमिट मरीजों को भी ज्यादातर बाहर से ही दवाई की खरीदारी करनी पड़ रही है. जबकि अस्पताल में जितनी दवाई होनी चाहिए वह सारी दवाई मरीजों के लिए उपलब्ध नहीं है. आउटडोर, इमरजेंसी और कंजूमल मिलाकर कुल 202 किस्म की दवाई अस्पताल में होनी चाहिए. जबकि अभी 150 किस्म की दवाई अस्पताल के दवाई स्टोर में मौजूद है.
मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रही है दवा : सदर अस्पताल में हर किस्म की दवाई रहने के बाद भी मरीजों को बाहर दवाई खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है. वर्तमान समय में ओपीडी में 71 किस्म की दवाई में 45 किस्म की दवा, इमरजेंसी में 96 किस्म की दवाई में 80 किस्म की दवाई, कंजूमल 35 में 25 किस्म की दवाई अस्पताल में मौजूद है. जबकि दवाई खरीदारी के नाम खासकर लेबर रूम में मरीज के परिजन हमेशा उलझते रहते हैं.
दरअसल सदर अस्पताल लेबर रूम में बिचौलिए पूरी तरह से हावी है. मरीजों को दवाई मुहैया कराने के नाम पर पैसे की उगाही की जाती है. पैसे लेने के बाद ही मरीजों को दवाई उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है. जिससे गरीब मरीज सबसे ज्यादा परेशान होते हैं. स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की माने तो प्रसव कराने आने वाले मरीजों को हर सुविधा अस्पताल में दी जाती है.
बच्चा के जन्म लेने के बाद जच्चा बच्चा के डिस्चार्ज होने तक कुछ दवाई को छोड़ सारी दवाई अस्पताल की ओर से दी जाती है. जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है. प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं को बाहर से ही दवाई की खरीदारी की जाती है. जबकि डिस्चार्ज होने पर कई सारे दवाई बाहर से ही खरीदे जाते हैं.
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