Kargil Vijay Diwas 2023: कारगिल विजय में बिहार रेजीमेंट ने दिया था पहला बलिदान

Updated at : 26 Jul 2023 8:49 AM (IST)
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Kargil Vijay Diwas 2023: कारगिल विजय में बिहार रेजीमेंट ने दिया था पहला बलिदान

Kargil Vijay Diwas 2023: इस युद्ध में बिहार रेजीमेंट के 18 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान देने का काम किया. इतना ही नहीं बिहार के लिए यह और भी गर्व की बात है कि कारगिल युद्ध में सबसे पहले शहीद होने वालों में शामिल मेजर मरियप्पन सर्वानन बिहार रेजिमेंट से ही आते हैं.

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भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 में हुई युद्ध की तरह ही कारगिल युद्ध के दौरान भी बिहार रेजीमेंट के सैनिकों ने देश की आन-बान और शान की रक्षा की थी. कारगिल युद्ध के दौरान भी बिहार रेजिमेंट सुर्खियों में रहा था. इस युद्ध में बिहार रेजीमेंट के 18 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान देने का काम किया. इतना ही नहीं बिहार के लिए यह और भी गर्व की बात है कि कारगिल युद्ध में सबसे पहले शहीद होने वालों में शामिल मेजर मरियप्पन सर्वानन बिहार रेजिमेंट से ही आते हैं. इन्हें बटालिक का हीरो भी कहा जाता है. जब सेना को बटालिक में दुश्मन की हरकत की जानकारी मिली, तो मेजर मरियप्पन को आगे जानकारी के लिए भेजा गया. उन्होंने अकेले ही दो बंकरों को नष्ट कर दिये. इस दौरान उनके पास कोई बैकअप भी नहीं था, लेकिन फिर भी मेजर मरियप्पन पीछे नहीं हटे और 29 मई 1999 को शहीद हो गये थे. करगिल की घमासान लड़ाई की वजह से उनका शव 3 जुलाई को बर्फ में ढका मिला.

बिहार रेजीमेंट को मिले थे 28 वीरता पुरस्कार

करीब 66 दिनों तक चले कारगिल युद्ध में अग्रिम पंक्ति में पहला बलिदान बिहार रेजीमेंट प्रथम बटालियन के मेजर एम. सरावनन और उनकी टुकड़ी में शामिल नायक गणेश प्रसाद यादव, सिपाही प्रमोद कुमार, सिपाही ओम प्रकाश गुप्ता और हवलदार हरदेव सिंह ने दिया था. नायक शत्रुघ्न सिंह दुश्मनों की गोली लगने के बाद 11 दिनों बाद मृत्यु को पराजित कर अपने देश की जमीन पर वापस लौटे थे. कारगिल युद्ध में बिहार रेजीमेंट की प्रथम बटालियन को 28 वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इनमें चार वीर चक्र और छह सेना मेडल के साथ बैटल आनर आफ बटालिक और थिएटर आनर आफ कारगिल का सम्मान शामिल है. करगिल युद्ध में शहीद कैप्टन गुरजिंदर सिंह सूरी को मरणोपरांत महावीर चक्र से, तो मेजर मरियप्पन सरावनन को मरणोपरांत वीरचक्र से सम्मानित किया गया. पटना के गांधी मैदान के पास कारगिल चौक पर कारगिल युद्ध में शहीद 18 जांबाजों की शहादत की याद में स्‍मारक बनाया गया है.

पहले ही हमले में पाक के दो घुसपैठिए मारे गये

कारगिल में दुश्मनों के कब्जे की जानकारी 17 मई, 1999 को हो गयी थी. उन दिनों बिहार रेजीमेंट की प्रथम बटालियन कारगिल जिले के बटालिक सेक्टर में पहले से ही तैनात थी. बटालिक सेक्टर की जुब्बार पहाड़ी पर भारी हथियार के साथ दुश्मनों ने कब्जा कर लिया था. बिहार रेजीमेंट को जुब्बार पहाड़ी को अपने कब्जे में लेने की जिम्मेदारी सौंपी गयी. 21 मई को मेजर एम सरावनन अपनी टुकड़ी के साथ रेकी पर निकल गये. करीब 14,229 फीट की ऊंचाई पर बैठे दुश्मनों ने फायरिग शुरू कर दी. मेजर सरावनन ने 90 एमएम राकेट लांचर अपने कंधे पर उठाकर दुश्मनों पर हमला बोल दिया. पाकिस्तानी दुश्मनों को इससे भारी नुकसान हुआ. पहले ही हमले में पाक के दो घुसपैठिए मारे गये. यहीं से कारगिल युद्ध की शुरुआत हो गयी.

पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ते हुए कारगिल की पहाड़ियों पर तिरंगा लहराया

युद्ध के दौरान अग्रिम पंक्ति में नायक गणेश प्रसाद यादव, सिपाही प्रमोद कुमार, ओम प्रकाश गुप्ता और हरदेव सिंह बलिदान चढ़ते गये. नायक शत्रुघ्न सिंह को गोली लग चुकी थी. बिहार रेजीमेंट के जाबांज सैनिकों ने एक जुलाई को जुब्बार पहाड़ी पर विजय प्राप्त कर बिहार रेजीमेंट की वीरता का ध्वज लहरा दिया. कारगिल विजय की कहानी यहीं लिखी गई और अंतत: 26 जुलाई को टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा कर युद्ध विजय की घोषणा कर दी गयी. भारतीय इतिहास में 26 जुलाई, 1999 का ही वह दिन था जब भारतीय सेना के जवानों ने अपने अद्म्य साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ते हुए कारगिल की पहाड़ियों पर तिरंगा लहराया था. इसी की याद में हर वर्ष 26 जुलाई का दिन कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है.

शौर्य की निशानी मौर्य संग्रहालय में रखी गई

21 साल बाद भी देश सेना के इन सपूतों के बलिदान को भूला नहीं है. कारगिल विजय दिवस के मौके पर हजारों फीट ऊंचे पहाड़ी पर हुए इस युद्ध में देश पर जान न्योछावर करने वाले शहीदों के अपनी कुरबानी देकर दुश्मनों को पीछे धकेलते हुए ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था तथा भारत की भूमि को घुसपैठियों के चंगुल से मुक्त कराया था. कारगिल युद्ध में बिहार रेजीमेंट की वीरता और शौर्य की निशानी मौर्य संग्रहालय में रखी गई है. पाकिस्तानी दुश्मनों के ठिकाने से भारी संख्या में हथियार जब्त किए गए, जिसे संग्रहालय में रखा गया है.

1941 में हैदरराबाद रेजीमेंट से अलग होकर बना था बिहार रेजीमेंट

उल्लेखनीय है कि बिहार रेजिमेंट के जवानों को दुश्मन किलर मशीन, जंगल वॉरियर्स और बजरंग बली आर्मी नाम से भी जानते हैं. बिहार रेजिमेंट का गठन 1941 में हैदराबाद रेजीमेंट अलग कर हुआ था और इसका सेंटर दानापुर कैंट, पटना में है. बिहार रेजीमेंट के पहले नन ऑपरेशनल लेफ्टिनेंट कर्नल महाराजा कामेश्वर सिंह थे. हालांकि, बिहार रेजिमेंट में देशभर से सैनिक शामिल होते हैं. 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के 96 हजार सैनिकों ने बिहार रेजिमेंट के जांबाजों के सामने ही बांग्लादेश में सरेंडर किया था. कहा जाता हैं कि पाकिस्तानी सैनिकों में बिहार रेजिमेंट के सैनिकों के लड़ाई के तेवर का इतना खौफ था कि वह लड़ने को तैयार ही नहीं हुए. चर्चा है कि इतनी बड़ी सेना ने बिना लड़े ही हथियार डाल दिए जाने की घटना दुनियाभर के सैनिक इतिहास में एक रिकॉर्ड था.

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