कैमूर के पहाड़ पर मिला 'महाबोधि मंदिर', 2 फीट ऊपर, 25 फीट जमीन में दबे होने का दावा

Published by : Anjani Pandey Updated At : 11 Jun 2026 6:00 AM

विज्ञापन

मंदिर के पास मौजूद लोग.

Kaimur News : महाबोधि शैली में बने इस मंदिर से इतिहास की कई नई कहानियां सामने आ सकती हैं. साथ ही कैमूर को भी बौद्ध सर्किट से जोड़कर यहां धार्मिक पर्यटन का विस्तार किया जा सकता है. पूरी खबर नीचे पढ़ें...

विज्ञापन

रामपुर (कैमूर) से राजू कुमार की रिपोर्ट
Kaimur News : कैमूर के रामपुर प्रखंड अंतर्गत पसाई पंचायत की खजुरा पहाड़ी ने इतिहास का एक नया पन्ना खोल दिया है. यहां जमीन के अंदर दफन एक प्राचीन मंदिर का शिखर भाग बाहर दिख रहा है, जिसे पुरातत्व विशेषज्ञ महाबोधि मंदिर की प्रतिकृति (रेप्लिका) मान रहे हैं. पाल वंश के समय बना यह मंदिर करीब 25 फीट तक जमीन में दबा है, जिसे स्थानीय लोग वर्तमान में ‘खलासि माता मंदिर’ के नाम से पूजते हैं और सावन में खीर-पूड़ी चढ़ाते हैं.

तीन शिखर के अलावा बाकी संरचना जमीन में दफन

रामपुर प्रखंड के खजुरा गांव से एक किलोमीटर दूर पहाड़ी पर 200 मीटर झाड़ियों के बीच ईंटों से बना तीन शिखर वाला ढांचा दिखता है. स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यह मंदिर का ऊपरी शिखर भाग है और नीचे कम से कम 25 फीट तक मंदिर की ऊंचाई होने की संभावना है. मंदिर की बनावट, ईंटों की जुड़ाई और शिखर शैली बोधगया के महाबोधि मंदिर से मिलती-जुलती है. आमलक, कलश और गवाक्ष की शैली साफ तौर पर पाल कालीन बौद्ध वास्तुकला की पहचान कराती है. इसी आधार पर इतिहासकार इसे महाबोधि मंदिर की प्रतिकृति बता रहे हैं.

बेलाव गांव के मृत्युंजय मौर्या ने जानकारी मिलने पर पहले खुद स्थल का मुआयना किया फिर बाकी लोगों को जानकारी दी. यहां पत्थरों पर बारीक नक्काशी साफ दिखती है और चारों तरफ लाल चुनरी व पूजा सामग्री रखी है. पहाड़ी पर स्थित मंदिर परिसर में स्थानीय श्रद्धालुओं द्वारा पूजा-पाठ की सामग्री और त्रिशूल गड़ा है, पेड़ पर लाल ध्वज-चुनरियां बंधी हैं और बजरंगबली की सिंदूर लगी प्रतिमा भी स्थापित है, जो संस्कृति के समन्वय का सटीक उदाहरण है.

मंदिर के पास स्थानीय लोग

शिलालेख को चबूतरे में दबाने का दावा

ग्रामीणों का दावा है कि करीब 20 साल पहले खुदाई के दौरान यहां एक प्राचीन शिलालेख भी मिला था. लेकिन, जानकारी के अभाव में लोगों ने उसे मंदिर के सामने बने चबूतरे के अंदर ही दबा दिया. बुजुर्ग शिवपूजन सिंह बताते हैं कि शिलालेख पर कुछ लिखा था, लेकिन कोई पढ़ नहीं पाया. इस डर से कि कहीं प्रशासन उसे ले न जाए, उसे चौतरे में ही रखवा दिया गया. पुरातत्व विभाग के लिए यह शिलालेख काल निर्धारण की अहम कड़ी साबित हो सकता है.

मंदिर की पूजा करते ग्रामीण.

‘खलासि माता’ के रूप में हो रही पूजा

सदियों से जमीन में दबे होने के कारण इस मंदिर का मूल स्वरूप बदल गया है. स्थानीय लोगों ने इसे ‘खलासि माता’ का मंदिर मानकर पूजा शुरू कर दी. हर सावन महीने में यहां महिलाएं खीर-पूड़ी का भोग लगाती हैं, वहीं नवरात्र और सोमवार को भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है.

हमारे दादा-परदादा के समय से यहां पूजा हो रही है. माता सबकी मनोकामना पूरी करती हैं. हमें पहले से यह नहीं पता था कि यह एक बौद्ध मंदिर है.

ग्रामीण सुरेश बिंद का बयान

पाल वंश काल का गढ़ था यह इलाका: इतिहासकार

एसपी जैन कॉलेज के इतिहासकार व भाषा वैज्ञानिक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह के अनुसार, प्रारंभिक आकलन के मुताबिक यह मंदिर 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच पाल वंश के शासनकाल में बना है. पाल राजाओं के समय में बौद्ध धम्म का ध्वज पूरे भारत में फहरता था. पाल वंश के शासक धर्मपाल, देवपाल और महीपाल बौद्ध धर्म के बड़े संरक्षक थे, जिन्होंने नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे विश्वविद्यालय बनवाए. कैमूर का इलाका भी उस समय बौद्ध शिक्षा और संस्कृति का केंद्र रहा होगा, खजुरा पहाड़ी का यह मंदिर उसी समृद्ध विरासत का प्रमाण है.

शिखर की शैली, ईंटों का आकार और चुनाई पाल काल की है. अगर वैज्ञानिक तरीके से इसका उत्खनन हो तो गया के महाबोधि मंदिर जैसी प्रतिकृति की विशाल संरचना निकल सकती है. यह मगध और काशी के बीच बौद्ध धर्म के प्रसार की एक नई कड़ी जोड़ेगा.

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, इतिहासकार व भाषा वैज्ञानिक

वैज्ञानिक उत्खनन और संरक्षण की मांग

ग्रामीणों ने पुरातत्व विभाग और बिहार सरकार से मांग की है कि जल्द से जल्द खजुरा पहाड़ी का उत्खनन कराया जाए और चौतरे में दबे शिलालेख को सुरक्षित निकाला जाए. इससे कैमूर के पर्यटन और इतिहास दोनों को एक नई पहचान मिलेगी.

क्यों खास है यह खोज:

  • बोधगया के बाद दूसरी महाबोधि शैली का मंदिर कैमूर में मिलने की प्रबल संभावना.
  • पाल काल में बौद्ध धर्म के प्रभाव का एक ठोस पुरातात्विक प्रमाण.
  • कैमूर को बौद्ध सर्किट से जोड़ने का मौका, जिससे पर्यटन स्थल के रूप में विकास होगा.
  • शिलालेख मिलने से इतिहास की कई नई तिथियां सामने आ सकती हैं.

खजुरा पहाड़ी की गोद में दफन यह मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि हजार साल पुराना इतिहास है. वैज्ञानिक उत्खनन से कैमूर का नाम विश्व धरोहर में दर्ज हो सकता है, जिसके लिए विरासत बचाने हेतु अभी कार्रवाई करने की बेहद जरूरत है.

विज्ञापन
Anjani Pandey

लेखक के बारे में

By Anjani Pandey

अंजनी पांडेय बिहार की डिजिटल मीडिया में कार्य करने का 10+ वर्षों का अनुभव रखते हैं। उन्होंने पटना में दैनिक भास्कर और लाइव सिटीज़ जैसे प्रमुख डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न संपादकीय भूमिकाओं में काम किया है। उन्हें न्यूज़रूम संचालन, कंटेंट रणनीति और डिजिटल संपादन का गहरा अनुभव है। मई 2026 में उप मुख्य कंटेंट राइटर और टीम लीड के तौर पर प्रभात खबर से जुड़ने से पहले करीब डेढ़ साल तक वे राजनीतिक संचार और जनसंपर्क से भी जुड़े रहे हैं। राजनीति, अपराध और समसामयिक घटनाओं से जुड़ी खबरों के आइडिएशन और संपादन में उनकी विशेष रुचि है।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन