आजादी के सात दशक बीत गये, लेकिन कई गांवों में अब तक नहीं पहुंची विकास की किरण
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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मोहनिया सदर : आजादी के 69 साल बाद भी प्रखंड के अकोढ़ीमेला पंचायत के कुछ गांवों में विकास की किरण तक का नहीं पहुंचना, यहां के लोगों का दुर्भाग्य और पंचायत के जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा ही कही जायेगी. सरकार गांवों के विकास के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रही है, लेकिन यहां तो स्थिति यह […]
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मोहनिया सदर : आजादी के 69 साल बाद भी प्रखंड के अकोढ़ीमेला पंचायत के कुछ गांवों में विकास की किरण तक का नहीं पहुंचना, यहां के लोगों का दुर्भाग्य और पंचायत के जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा ही कही जायेगी.
सरकार गांवों के विकास के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रही है, लेकिन यहां तो स्थिति यह है कि आज भी इन गांवों के ग्रामीणों को विकास पुरुष का इंतजार है ,जो अब इनको मुखिया व बीडीओ के रूप में मिल गये हैं. यदि हम बात करे पंचायत के जिगना गांव की, तो लोगों को गांव की गलियों में घुटने भर पानी से होकर गुजरना पड़ता था, लेकिन विगत वर्ष 2016 में हुए पंचायत चुनाव में मुखिया बनने के बाद लल्लन पासी ने दस लाख की लागत से गांव की सभी गलियों की पीसीसी ढलाई शुरू करायी, जो एक सप्ताह में पूरा हो जायेगा.
वहीं, पंचायत की महादलित बस्ती पट्टी की बात करें, तो यहां आज भी गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को रास्ता नसीब नहीं हो सका है. यहां के ग्रामीण सावठ माइनर पर बिजली का पोल रख नहर पार कर अपने घरों तक पहुंचते हैं. इस बस्ती में गलियों के निर्माण के नाम पर आज तक एक ईंट भी नहीं लगायी गयी है. बताया जाता है कि पांच वर्ष पहले बरसात के दिनों में इसी माइनर को पोल के सहारे पार करने के दौरान एक बच्चा नहर में गिर गया था जिससे उसकी मौत हो गयी थी. यहां वोटरों की संख्या लगभग 450 है, जो पंचायत चुनाव में किसी भी प्रत्याशी के राजनीतिक भाग्य का फैसला करने के लिए काफी है, लेकिन किसी ने भी ग्रामीणों की ओर ध्यान नहीं दिया. इसी पंचायत के डुमरपोखर गांव के लोग भी रास्ता के अभाव में कुछ इसी तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं. स्थिति यह है कि पंचायत मुख्यालय में स्थित पंचायत भवन तक डुमरपोखर से पहुंचने के लिए 22 किमी की दूरी तय करते हुए देवहलियां व रहारी होकर पहुंचना होता है.
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