फसल तो दूर, प्यास बुझानी होगी मुश्किल !

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भभुआ (नगर) : जेठ की दोपहर अभी दूर है. लेकिन, अभी से जिले के विभिन्न इलाकों में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है. मैदानी इलाकों में लगे चापाकल ने पानी देना बंद कर दिया है. कुछ गांवों में तो ग्रामीण सूखे गले को तर करने के लिए काफी दूरी से पानी ला रहे हैं. […]

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भभुआ (नगर) : जेठ की दोपहर अभी दूर है. लेकिन, अभी से जिले के विभिन्न इलाकों में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है. मैदानी इलाकों में लगे चापाकल ने पानी देना बंद कर दिया है. कुछ गांवों में तो ग्रामीण सूखे गले को तर करने के लिए काफी दूरी से पानी ला रहे हैं. निजी चापाकलों में अभी से 10-15 फुट पाइप बढ़ाना शुरू कर दिया गया. ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को खाना बनाने में भी पानी की वजह से काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. लोगों की माने तो इस साल पेयजल संकट सरकार व प्रशासन के लिए गले की हड्डी बनेगी. यदि प्रशासन ने समय रहते इसका समाधान नहीं किया, तो आगे गांवों में टैंकर से पानी पहुंचाना पड़ेगा. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो लोगों को पानी के लिए आंदोलन करना पड़ेगा.
गौरतलब है कि लगातार दो वर्षों से कम हो रही बारिश की वजह से जल स्तर काफी नीचे खिसक गया है. लिहाजा, किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए भूगर्भ जल का दोहन कर अपनी फसल को मजबूरी में बचा रहे हैं. इन दो वर्षों में भूगर्भ जल का दोहन इतना ज्यादा हुआ है कि इलाके का जल स्तर 15-20 फुट नीचे चला गयाहै. सतही जल की कौन कहे, बड़े-बड़े जलाशयों में पानी काफी कम है.
बंद पड़े हैं 4892 चापाकल : जिले में पीएचइडी द्वारा कुल 19366 चापाकल विभिन्न क्षेत्रों में लगाये गये हैं, जिसमें करीब 14,474 चालू हैं व 4892 चापाकल मरम्मत के अभाव में महीनों से बंद पड़े हुए हैं.
ग्रामीण बंद पड़े चापाकलों को चालू कराने के लिए विभिन्न सरकारी कार्यालयों का चक्कर लगा रहे हैं. पर, अधिकारी हर बार एक ही जवाब देते हैं कि चापाकलों को चालू कराने के लिए विभागीय कार्रवाई चल रही है. कई ग्रामीणों ने तो बंद पड़े चापाकलों को चालू कराने के लिए जिलाधिकारी के जनता दरबार से लेकर पीएचइडी के कार्यालय में आवेदन दिया है. मगर, बंद पड़े चापाकल कब तक चालू होंगे, इसकी सही जानकारी कोई नहीं दे रहा. विभिन्न पंचायतों द्वारा लगाये गये चापाकल ने भी साथ छोड़ दिया है.
वहीं, पंचायत चुनाव में आदर्श आचार संहिता लगने के वजह से चापाकलों की मरम्मत भी नहीं हो पा रही है. लिहाजा, जब कड़ाके की गरमी पड़ेगी व जल स्तर और नीचे जायेगा, तो जो चापाकल पानी दे रहे हैं, वे भी पानी देना बंद कर देंगे. लोगों का कहना है कि ऐसा पहली बार होगा जब मैदानी इलाकों में पानी के लिए हाहाकार मचेगा.
अधौरा की मुश्किलें नहीं होंगी कम : जिले के नक्सलग्रस्त अधौरा प्रखंड में वैसे तो हर साल पेयजल की समस्या उत्पन्न होती है. सरकारी स्तर पर चल रही योजनाओं का भरपूर लाभ यहां के लोगों को मिल नहीं पाता है.
पेयजल समस्या को दूर करने के लिए अधौरा के चकरघट्टा, सारोदाग व भड़ेहरा में जलापूर्ति योजना का निरीक्षण भी डीएम राजेश्वर प्रसाद सिंह ने किया व जल्द से जल्द लोगों तक पानी पहुंचाने का निर्देश पीएचइडी को दिया. वहीं, सारोदाग व भड़ेहरा में जलापूर्ति योजना का काम पूरा हो चुका है. मगर, इस योजना से ग्रामीणों को पानी कब तक मिलेगा, इस मामले में संशय बरकरार है.
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