भारत माता की जंजीर को तोड़ने बिहार की माटी से निकले थे कई सपूत, मुजफ्फरपुर के वीरों के बलिदान को जानिए..

Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 13 Aug 2023 3:00 PM

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स्वतंत्रता दिवस 2023 नजदीक आते ही देश आजादी के त्योहार को मनाने के लिए तत्पर है. देश को आजाद कराने में बिहार की बड़ी भूमिका रही थी. यहां से अनेकों ऐसे क्रांतिकारी हुए जिन्होंने भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी थी. जानिए मुजफ्फरपुर से जुड़े इतिहास को..

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independence day 2023: देश आजादी के जश्न में डूबने की तैयारी में है. हर एक कोने में राष्ट्रध्वज तिरंगे को सलामी दी जायेगी. हमें यह हमेसा स्मरण करना चाहिए यह आजादी हमें ऐसे ही नहीं मिली है. देश के अनगनित सपूतों ने आजादी के लिये अपने प्राणों की बलि दी है. आजादी के दीवाने चाहते थे कि आने वाली पीढ़ी गुलामी से मुक्त होकर खुली हवा में सांस ले सके. इसके लिये उन्होंने अपने जान की परवाह नहीं की. आजादी आंदोलन के दौरान मुजफ्फरपुर उत्तर बिहार का मुख्य केंद्र हुआ करता था. यहां के कई वीरों ने खुद को कुर्बान किया तो कई क्रांतिकारियों ने मुजफ्फरपुर की जमीं से क्रांति की शुरुआत की. पढ़िये आजादी के दीवानों पर रिपोर्ट

खुदीराम बोस ने किया था आजादी का पहला धमाका

पश्चिम बंगाल में जज किंग्सफोड के विरुद्ध आक्रोश को देखते हुये उसका तबादला मुजफ्फरपुर के न्यायाधीश के तौर पर कर दिया था. उसे मारने के लिये खुदीराम बोस मिदनापुर से यहां पहुंचे थे. 30 अप्रैल, 1908 को खुदीराम ने कंपनीबाग स्थित यूरोपियन क्लब के समीप जज की बग्घी समझ कर बम फेंका था. दुर्योग से उस बग्घी में जज नहीं, बल्कि दो यूरोपियन महिला थी, जो मारी गयी. खुदीराम बोस पूसा से पकड़े गये. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि उन्होंने बम फेंका था. 11 अगस्त, 1908 को मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी की सजा हुई. उस वक्त खुदीराम की उम्र 18 वर्ष थी.

प्रफुल्ल चाकी ने खुद को मार ली थी गोली

प्रफुल्ल चाकी खुदीराम बोस के साथ ही न्यायाधीश किंग्सफोर्ड को मारने के लिये मुजफ्फरपुर आये थे. बम फेंकने के बाद दोनों रेलवे लाइन पकड़ कर पैदल पूसा की ओर रवाना हुये. प्रफुल्ल समस्तीपुर पहुंचे, जहां एक रेल कर्मचारी त्रिगुणा चरण घोष ने उन्हें शरण दी. एक मई 1908 को, उन्हें मोकामा के लिए प्रस्थान करने वाली रात की रेलगाड़ी में चढ़ने के लिए एक इंटर-क्लास टिकट भी दिया गया था, परंतु उसी डिब्बे में यात्रा कर रहे एक पुलिस अधिकारी नंदलाल बैनर्जी को प्रफुल्ल पर संदेह हुआ और उन्होंने मोकामा रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर उन्हें गिरफ़्तार करने का प्रयास किया. निडर प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिये अपने पिस्तौल से खुद को गोली मार ली थी.

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भगवान लाल ने सीने पर खायी गोलियां

सरैयागंज निवासी भगवान लाल का जन्म 28 सितंबर, 1912 को सरैयागंज स्थित एक निम्न परिवार में हुआ था. इनके पिता फेरी से कपड़ा बेचा करते थे. भगवान लाल चौथी क्लास से ही अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सभा में भाग लेने लगे. बाद में इन्होंने गांधी टोपी बेचना शुरू किया. 14 नवंबर 1930 के दिन तिलक मैदान में सभा का आयोजन था. अंग्रेजी सरकार ने लोगों की भीड़ रोकने के लिये नगर में धारा 144 लगा दी थी. फिर भी लोगों की भीड़ जुटी और तिलक मैदान में तिरंगा फहराया गया. वहां मौजूद अंग्रेजी अफसरो ने झंडा उतारने का आदेश दिया, लेकिन भगवान लाल स्तंभ पर चढ़ गये और झंडा नहीं उतारने दिया. इससे गुस्साये एसपी हिचकॉक ने गोली चलाने का आदेश दिया. भगवान लाल के सीने पर तीन गोली लगी और वे वहीं शहीद हो गये.

तिरहुत के पहले शहीद थे वारिस अली

1857 की जंगे आजादी की लड़ाई में शहीद होने वाले तिरहुत के पहले शहीद वारिस अली थे. वारिस अली बरुराज थाना के जमादार थे. अंग्रेजों के बारे में उनकी धारणा थी कि वह लोग जबरन हमारे देश पर कब्जा किए हुए हैं.उन पर बागियों से संपर्क रखने का आरोप था. मुजफ्फरपुर की फौजदारी अदालत में 22-23 जून, 1857 को कई लोगों ने उनके खिलाफ गवाही दी. सजा के तौर पर उन्हें सुगौली भेजा गया और फिर उन्हें पटना भेज दिया गया. पटना में ही 6 जुलाई, 1857 को उन्हें फांसी दी गयी. आजादी के आंदोलन में तिरहुत के 48 लोगों ने शहादत दी थी, जिनमें कई नाम के गुमनाम है़ं.

मुजफ्फरपुर के क्रांतिकारी वैनी में करते थे बैठक

समस्तीपुर का पूसा (वैनी) एक दौर में आजादी की लड़ाई का केंद्र था. मुजफ्फरपुर के तेपरी के नथुनी शर्मा, महमदा के रामश्रेष्ठ प्रसाद सिंह, उमा प्रसाद सिंह, पूसा बाजार के चलित्तर साह सहित एक दर्जन क्रांतिकारी आजादी की लड़ाई के स्थानीय नीति-निर्धारक और समन्वयक थे. इनके नेतृत्व में वार रूम में गुप्त बैठक होती थी. अखिल भारतीय चरखा संघ का कार्यालय भारत छोड़ो आंदोलन में इस क्षेत्र के क्रांतिकारियों के लिए वार रूम बन गया था. युवाओं का यहीं जुटान होता और रणनीति बनती थी. देर रात मीटिंग होती और सुबह अलग-अलग दल बनाकर उसे पूरा किया जाता था. क्रांतिकारियों ने 9 अगस्त, 1942 को पूसा और ढोली के बीच रेल पटरी उखाड़ दी थी. इस क्षेत्र में टेलीफोन का तार काटकर संचार बाधित कर दिया था. वैनी के डाकघर में आग लगाने के बाद एक दल पूसा पहुंचा और फ्लैक्स हाउस में आग लगा दी.

थानेदार को जलाकर फांसी पर झूले जुब्बा सहनी

मीनापुर के चैनपुर में 1906 में जन्म लेने वाले जुब्बा सहनी और उनके साथियों ने 16 अगस्त, 1942 को मीनापुर थाना के थानेदार लुई वालर को थाना में ही जिंदा जला दिया और वहां यूनियन जैक को उतार कर तिरंगा फहराया. इस घटना की सारी जिम्मेवारी जुब्बा सहनी ने अपने ऊपर ले ली. गिरफ्तारी के बाद जब जुब्बा सहनी से पूछा गया कि अंग्रेज थानेदार को जलाने में कौन-कौन साथ था, उन्होंने अपने 54 साथियों को बचाते हुये कहा कि वे अकेले ही थाने में जाकर थानेदार को जलाया. उन्होंने न्यायाधीश को कहा कि मुझे फांसी की सजा सुनाये. थानेदार को जलाने पर जज ने फांसी की सजा सुनायी और 11 मार्च, 1944 को भागलपुर जेल में फांसी दी गयी.

14 मई, 1934 को बैकुंठ शुक्ल को हुई थी फांसी

बैकुंठ शुक्ल का जन्म 15 मई, 1907 को पुराने मुजफ्फरपुर के लालगंज थानांतर्गत जलालपुर गांव में हुआ था. उनके पिता राम बिहारी शुक्ल किसान थे. बैकुंठ शुक्ल ने1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय सहयोग दिया और पटना के कैंप जेल गए. जेल प्रवास के दौरान वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के संपर्क में आए और क्रांतिकारी बने. अंग्रेजी हुकूमत के दबाव में रेवोल्यूशनरी पार्टी के ही सदस्य फणींद्र नाथ घोष सरकारी गवाह बने. जिसके कारण 1931 में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षडयंत्र कांड में फांसी की सजा हुई. विश्वासघात की सजा देने का बीड़ा बैकुंठ शुक्ल ने उठाया और 9 नवंबर 1932 को घोष को मारकर इसे पूरा किया. 14 मई 1934 को गया केंद्रीय जेल में बैकुंठ शुक्ल को फांसी की सजा हुई.

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