गया : खुद के स्वास्थ्य से न करें समझौता, जिंदगी कई बार नहीं देती संभलने का दूसरा मौका
Updated at : 18 Feb 2019 9:50 AM (IST)
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प्रसनजीत गया : एक सामान्य परिवार के बजट में शिक्षा के बाद सबसे अधिक खर्च स्वास्थ्य पर होता है. मौजूदा वक्त में हर व्यक्ति चाहे वह बच्चा हो या वयस्क, किसी न किसी बीमारी से ग्रसित है. ऐसे में बेहतर स्वास्थ्य के लिए डाॅक्टरों और दवाखानों का चक्कर लगातार बना रहता है. मासिक आय का […]
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प्रसनजीत
गया : एक सामान्य परिवार के बजट में शिक्षा के बाद सबसे अधिक खर्च स्वास्थ्य पर होता है. मौजूदा वक्त में हर व्यक्ति चाहे वह बच्चा हो या वयस्क, किसी न किसी बीमारी से ग्रसित है. ऐसे में बेहतर स्वास्थ्य के लिए डाॅक्टरों और दवाखानों का चक्कर लगातार बना रहता है. मासिक आय का एक बड़ा हिस्सा इसमें चला जाता है.
हिर है कि आर्थिक दबाव बना रहता है. अगर घर में किसी को कोई गंभीर बीमारी हो गयी, तो परिवार की पूरी जमा पूंजी उसके इलाज में चली जायेगी. ऐसी गंभीर परिस्थिति में जो सबसे चौंकाने वाली बात है कि अधिकतर लोगों को स्वास्थ्य बीमा की जानकारी ही नहीं है. इसकी पुष्टि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की एक रिपोर्ट में भी हो जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक गया जिले में केवल 2.8 प्रतिशत परिवारों का ही स्वास्थ्य बीमा है. पूरे राज्य में यह आंकड़ा 12.3 प्रतिशत है. मगध प्रमंडल के दूसरे जिलों में नवादा में 18.7,औरंगाबाद में 20.5,जहानाबाद में 17.7 व अरवल में 25.0 प्रतिशत लोगों का स्वास्थ्य बीमा है.
यह आंकड़े बताते हैं कि तमाम प्रकार की जागरूकता के कमी में सबसे अहम स्वास्थ्य बीमा ही है. रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य बीमा नहीं करानेवालों में केवल गरीब व अनपढ़ लोग नहीं है, बल्कि इनमें वह लोग भी हैं जो ठीक-ठाक पढ़ाई कर अच्छे संस्थानों में काम कर रहे हैं. लोग इस बात को नहीं समझते कि जिंदगी कई बार दूसरा मौका नहीं देती. ऐसे में अगर बेहतर इलाज नहीं मिला तो जान जाना तय है.
वर्ष 2017 में एक निजी संस्था द्वारा कराये गये सर्वे के बाद जो रिपोर्ट अायी उसमें कहा गया कि भारत में केवल 44 प्रतिशत लोगों ने अपना स्वास्थ्य बीमा कर रखा है. इसी रिपाेर्ट में यह भी कहा गया कि भारत अपने कुल जीडीपी का केवल 4.7 प्रतिशत भाग ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च कर पाता है, जबकि यूनाइटेड स्टेट्स में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत है. थोड़ा और पीछे जायें, तो वर्ष 2013-14 में 76 प्रतिशत आबादी के पास स्वास्थ्य बीमा नहीं था. यानी तीन वर्षों में स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन अभी इसमें और सुधार की जरूरत है.
स्वास्थ्य बीमा के फायदे
आज के दौर में कोई भी व्यक्ति कब किस बीमारी से ग्रसित हो जायेगा, यह किसी को नहीं मालूम. ऐसे में बीमार व्यक्ति व उसके परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है. इस स्थिति में स्वास्थ्य बीमा बड़ी राहत देता है. स्वास्थ्य बीमा के कई लाभों में एक यह है कि बीमा सभी प्रकार के स्वास्थ्य लाभों को एक जैसे सेट में कवर करते हैं. डाॅक्टर के पास दिखाने, लैब टेस्ट, अस्पताल में भर्ती होने से लेकर सर्जरी तक में होने वाले खर्च का कवर मिलता है. बीमा होने का लाभ यह भी है कि व्यक्ति अपने इलाज में लगनेवाली एक मोटी रकम के बोझ से मुक्त हो जाता है.
प्रचार की कमी के कारण नहीं होता बीमा
यह एक अहम सच्चाई है कि स्वास्थ्य बीमा की गंभीरता को लेकर व्यापक प्रचार की कमी है. अधिकतर लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं है. उदाहरण के तौर पर गाड़ी खरीदने के वक्त शो रूम में ही मौजूद कर्मचारी गाड़ी के बीमा के लाभ की जानकारी दे देते हैं. इसका असर यह है कि आज हर कोई गाड़ी के बीमा के मामले में बहुत सजग है.
लेकिन, स्वास्थ्य बीमा को लेकर ऐसा कुछ नहीं होता. गेवाल बिगहा इलाके के राकेश कुमार ने बातचीत के दौरान कहा कि कुछ ऐसा नियम जरूर बनें कि जब भी कोई व्यक्ति अपना इलाज कराने क्लिनिक या अस्पताल में जाये, तो वहां डाॅक्टर या कर्मचारी उक्त बीमार व्यक्ति को स्वास्थ्य बीमा की जानकारी पूरे फायदे के साथ दें. इससे निश्चित तौर पर असर दिखेगा और लोग जागरूक होंगे.
तकनीकी खामियां भी एक कारण
स्वास्थ्य बीमा को लेकर कई स्तर पर तकनीकी खामियां सामने आती हैं. भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआइसी) के ही एक कर्मचारी के मुताबिक एलआइसी की ही स्वास्थ्य बीमा योजना में एक महत्वपूर्ण कमी है, जिसकी वजह से लोग बीमा नहीं कराते. उक्त कर्मचारी के मुताबिक एलआइसी की स्वास्थ्य बीमा योजना में कैशलेस व्यवस्था नहीं है.
ऐसे में अगर एक व्यक्ति बीमार है, तो पहले उसे अपने जेब से खर्च करने होंगे. इसके बाद वह बिल लेकर एलआइसी में जायेगा, तब उसे पैसे मिलेंगे. अब समस्या यह है कि एक गरीब व्यक्ति कहां से पहले पैसे खर्च करे. इस कारण से ही कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं लेता. हालांकि कुछ प्राइवेट कंपनी कैशलेस व्यवस्था देती है, लेकिन अधिक प्रीमियम होने की वजहसे लोग पीछे हट जाते हैं.
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