गया : नहीं कंट्रोल हुआ प्रदूषण, तो सांस लेना भी हो जायेगा दूभर
Updated at : 04 Dec 2018 6:18 AM (IST)
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जितेंद्र मिश्र, गया : शहर के लोगों के स्वास्थ्य की चिंता किसी को नहीं है. अगर यहां प्रदूषण स्तर में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो लोगों को सांस लेना भी मुश्किल हो जायेगा. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, सोमवार की शाम बिहार में पटना सबसे अधिक प्रदूषित व गया दूसरे स्थान पर रहा. इसमें […]
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जितेंद्र मिश्र, गया : शहर के लोगों के स्वास्थ्य की चिंता किसी को नहीं है. अगर यहां प्रदूषण स्तर में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो लोगों को सांस लेना भी मुश्किल हो जायेगा. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, सोमवार की शाम बिहार में पटना सबसे अधिक प्रदूषित व गया दूसरे स्थान पर रहा.
इसमें पटना का एयर क्वालिटी इंडेक्स 380 व गया का 302 रहा, जो सभी के लिए चिंता का विषय है. पिछले दिनों निगम अधिकारी व जिला प्रशासन की संयुक्त बैठक में झाड़ू से पहले पानी का छिड़काव व कोयला व लकड़ी वाले चूल्हे पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया था. इतना ही नहीं, नालियों से निकले सिल्ट का भी समय पर उठाव नहीं किया जाता है और वह सूखने के बाद धूल बन कर लोगों के शरीर के अंदर पहुंचता है.
लेकिन, अब तक इस दिशा में निगम से कोई प्रभावी काम शुरू नहीं किया गया है. विशेषज्ञों की बात मानें, तो शहर का प्रदूषण इस स्तर पर पहुंचता जा रहा है कि लोगों को सांस व त्वचा संबंधी कई तरह की बीमारियों का शिकार होना पड़ेगा. शहर में इतना धूल सांस से लोगों के शरीर के अंदर जा रहा है कि वे कई तरह की बीमारी के शिकार हो रहे हैं.
इसका असर कुछ दिनों में हर के शरीर में दिखने लगेगा. निगम के अधिकारी बात करने पर सिर्फ योजना तैयार कर लिए जाने की बात करते हैं. सिटी मैनेजर सह सफाई व्यवस्था के नोडल पदाधिकारी विष्णु प्रभाकर कहते हैं कि पिछले दिनों बैठक में पानी छिड़काव की बात उठी थी. देखते हैं, मौजूदा संसाधन में ही जल्द काम शुरू करने की व्यवस्था करते हैं. इनके बयान से साफ हो जाता है कि शहर के लोगों को स्वस्थ रखने के प्रति निगम के अधिकारी कितने तत्पर हैं.
सांस व त्वचा संबंधी गंभीर बीमारियों से लोग होंगे पीड़ित
जिस तरह से धूल की स्थिति शहर में है, उससे सांस के माध्यम से यह लोगों के शरीर के अंदर भी जायेगा. इससे त्वचा में एलर्जी की विभिन्न बीमारी से भी लोग पीड़ित होंगे. धूल के कारण लोगों के सांस लेने की गति कम होगी, फेफड़ा में धूल जमेगा, शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम होगा और इससे लोगों को सीने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ जैसी बीमारी होगी.
इससे बचने के लिए लोगों को अपनी गाड़ियों का समय-समय पर प्रदूषण जांच कराना, मास्क लगा कर बाहर निकलना, ग्रीन वातावरण में जाकर लंबी सांस लेना ही एक मात्र विकल्प है. पानी का छिड़काव करने से भी कुछ राहत मिल सकती है.
डॉ राहुल कुमार, विभागाध्यक्ष, मेडिसिन विभाग, एएनएमसीएच गया
लापरवाही का परिणाम है आज का पॉल्यूशन लेवल
भौतिक युग में लोगों को उनके द्वारा किये जा रहे काम का आनेवाले दिनों में क्या प्रभाव होगा, इसकी चिंता ही नहीं की जा रही है. प्रदूषण स्तर बढ़ना कोई एक दिन की बात है नहीं. इसमें हर तरफ से लापरवाही हुई है. विकसित शहर बनाने के चक्कर में हरा-भरे वातावरण को उजाड़ दिया गया. नगर निगम हाल के दिनों में कई तरह के अच्छे निर्णय लिये, लेकिन उस दिशा में एक भी काम जमीन स्तर पर नहीं हुआ.
बड़े शहरों में देखा जाता है कि धूल से लोगों को बचाने के लिए कई तरह के उपाय जैसे पानी का छिड़काव, मशीन से झाड़ू लगाना, नालियों के सिल्ट को निकलने के तुरंत बाद गंतव्य तक पहुंचा दिया जाता है. लेकिन, यहां यह सब कुछ अब तक जमीन पर नहीं दिख रहा है.
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