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देवाधिदेव महादेव के लिंग की पूजा का रहस्य

श्री शिवमहापुराण के विद्येश्वर संहिता में शैव शिरोमणि भगवान व्यास ने भगवान शिव के लिंग की पूजा के रहस्य तथा महत्व का संकलन किया है. भगवान शिव के नाम, गुण और लीलाओं का श्रवण, कीर्तन तथा मनन तीनों साधकों के लिए महान साधन कहा गया है, इसी साधनों द्वारा संपूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है. […]

श्री शिवमहापुराण के विद्येश्वर संहिता में शैव शिरोमणि भगवान व्यास ने भगवान शिव के लिंग की पूजा के रहस्य तथा महत्व का संकलन किया है. भगवान शिव के नाम, गुण और लीलाओं का श्रवण, कीर्तन तथा मनन तीनों साधकों के लिए महान साधन कहा गया है, इसी साधनों द्वारा संपूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है. परंतु श्रवण, कीर्तन, मनन तीनों साधनों में असमर्थ मनुष्य शिव के लिंग की पूजा करके, बिना यत्न के ही मोक्ष को प्राप्त कर सकता है.
देवताओं, ऋषि-मुनियों ने स्वयं भगवान शंकर से ही बड़ा ही पवित्र औरअद्भुत प्रश्न को जानने की इच्छा प्रकट की और कहा देवाधिदेव सभी देवताओं की पूजा मूर्ति रूप में ही होती है किंतु आपकी पूजा मूर्ति रूप और लिंग रूप में भी क्यों होती है ? इस प्रश्न का समाधान भगवान शिव ने स्वयं अपने श्रीमुख से कहा है जिसे व्यासजी ने पुराणों में वर्णित किया है.
एकमात्र भगवान शिव ही ब्रह्म रूप होने के कारण, निष्कल, निराकार, अव्यक्त, अजन्मा, विश्व प्रपंच का स्त्रष्टा, पालक एवं संहारक कहे गये हैं. रूपवान होने के कारण उन्हें सकल और साकार भी कहा गया है.
इसलिए भगवान शिव के साकार और निराकार दोनों रूप हैं. शिव के निष्कल, निराकार होने के कारण ही उनकी पूजा का आधारभूत लिंग भी निराकार ही प्राप्त हुआ है. अर्थात शिवलिंग शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है.
समस्त अंग साकार और निराकार रूप होने के कारण ‘शिव’ परब्रह्म परमेश्वर कहलाते हैं और लोग मूर्तिरूप (साकार) और लिंग रूप (निराकार) दोनों ही रूपों में भगवान शिव की पूजा करते हैं. अन्य देवतागण साक्षात परब्रह्म ं नहीं हैं, अत: कहीं भी उनके लिए निराकार (लिंग रूप) उपलब्ध नहीं है.
एक बार ब्रह्म और विष्णु के बीच लड़ाई छिड़ गयी, दोनों के विवाद से देवताओं में व्याकुलता मच गयी. देवताओं ने दिव्य कैलाश शिखर पर ब्रह्म -विष्णु के विवाद निबटारा हेतु देवाधिदेव की आराधना की.
देवाधिदेव ब्रह्म -विष्णु के बीच अगिA स्तंभ के रूप में उपस्थित हुए, ब्रह्म-विष्णु ने उस ज्योर्तिमय लिंग स्तंभ की ऊंचाई और थाह लेने का अथक प्रयास किया किंतु असफल हुए, लज्जित होकर ब्रह्म और विष्णु ने उस अनंत ज्योतिर्मय अग्नि स्तंभ का पूजन किया, पूजा से खुश होकर देवाधिदेव महादेव, मां पार्वती उस ज्योतिर्मय अनंत अगिA स्तंभ से प्रकट हुए. इस मार्गशीर्ष मास में आद्रा नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा तिथि को ‘शिवरात्रि’ के रूप में मनाया जाता है. ब्रह्मभाव शिव का निष्कल लिंग रूप है और महेश्वर भाव सकल (साकार) मूर्तिरूप है.
भगवान शिव ने खुद ही कहा है कि दोनों ही मेरे रूप हैं तनिक भी संदेह नहीं. मेरे विशाल, अनंत, ज्योतिस्तंभ, ज्योतिर्मय लिंग का दर्शन या पूजन कर पाना सभी भक्तों के लिए सुलभ हो सके, इसके लिए मैंने ही अनंत लघुरूप में इस विशाल ज्योतिर्मय लिंग को परिवर्तित कर दिया और विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न नामों से स्थापित हुआ और तब से मेरी पूजा लिंग रूप में होने लगी. देवाधिदेव स्वयं कहते हैं कि यह लिंग मेरा ही स्वरूप है और इसकी पूजा मेरे सामिप्य की प्राप्ति करानेवाला है.
शिवलिंग की पूजा, शिव की मूर्ति पूजा से उत्कृष्ट है. अन्य देवताओं की पूजा मूर्ति रूप में होती है लिंग रूप में नहीं. ‘शिवलिंग’ पूजन में वर्षा ऋतु के श्रवण मास को शुद्ध गंगाजल द्वारा पूजन सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जो इच्छित मनोकामना पूर्ण करती है.
-प्रदीप कुमार पाठक
Prabhat Khabar Digital Desk
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