डस्टबीन तो खरीद ली, पर रखने की जगह नहीं

Published at :06 Sep 2016 4:00 AM (IST)
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डस्टबीन तो खरीद ली, पर रखने की जगह नहीं

नगर पर्षद ने शहर को साफ-सुथरा रखने के लिए लाखों रुपये खर्च कर अस्टबीनों की खरीदारी की, पर इन डस्टबीनों को शहर में कहां लगाया जाये, इसके लिए कोई चिह्नित स्थान तय नहीं किया गया. वार्ड पार्षद भी इसे अपने वार्ड में लगाने से इंकार करते रहें. क्योंकि बड़े डस्बीनों के उठाव में काफी समस्या […]

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नगर पर्षद ने शहर को साफ-सुथरा रखने के लिए लाखों रुपये खर्च कर अस्टबीनों की खरीदारी की, पर इन डस्टबीनों को शहर में कहां लगाया जाये, इसके लिए कोई चिह्नित स्थान तय नहीं किया गया. वार्ड पार्षद भी इसे अपने वार्ड में लगाने से इंकार करते रहें. क्योंकि बड़े डस्बीनों के उठाव में काफी समस्या उत्पन्न हो रही थी.

बक्सर : जून माह में नगर पर्षद ने टेंडर के माध्यम से सफाई के 120 संसाधनों की खरीदारी की थी. इनमें 80 डस्टबीन और 40 हैंड ट्रॉली शामिल है. इसकी खरीदारी में लाखों रुपये खर्च किये गये, पर आज तीन माह बाद भी इन डस्टबीनों को रखने का कोई उचित स्थान नहीं मिल पाया. ऐसे में दर्जन भर से अधिक डस्टबीन जहां अब तक विभाग में पड़े हैं. वहीं, कई डस्टबीनों को तो सड़क पर जहां-तहां रखकर विभाग ने केवल कोरम पूरा किया है. नगर पर्षद की इस रवैया के कारण लाखों रुपये बरबाद हो रहा है. सूत्र बताते हैं कि इसकी खरीदारी में कमीशन का खेल भी जमकर हुआ था. यदि इस पूरे मामले की जांच हो, तो जरूर कुछ मामले सामने आ सकते हैं. डस्टबीनों के शहर में नहीं लगने से हर दिन कूड़े का अंबार दिखता है.
कुल 120 संसाधनों की हुई थी खरीदारी : नगर पर्षद ने 11 सौ लीटर और 640 लीटर के 40-40 डस्टबीनों की खरीदारी की थी. वहीं, 150 लीटर के 40 हैंड ट्रॉली की भी खरीदारी हुई थी. इनकी खरीदारी में कुल 50 लाख 53 हजार रुपये खर्च किये गये थे. इन संसाधनों की खरीदारी क्वालिटी इन भाव इंजीनियरर्स कंपनी से की गयी थी.
52 हजार से अधिक का है एक डस्टबीन : शहर के सड़कों पर जहां-तहां दिखनेवाले ग्रीन कलर के बड़े डस्टबीनों की कीमत शायद आप सुन कर चौंक जायेंगे, पर यह सही है कि एक डस्टबीन की कीमत 52 हजार आठ सौ 85 रुपये है. यानी बड़े डस्टबीनों की खरीदारी पर कुल 21 लाख 15 हजार 4 सौ रुपये खर्च किये गये हैं. वहीं, 640 लीटरवाले डस्टबीन की कीमत जो बड़े डस्टबीनों से थोड़ा छोटा है. प्रत्येक की कीमत 48 हजार 590 रुपये है. 19 लाख 43 हजार छह सौ रुपया खर्च हुआ है. जबकि हैं ट्रॉली पर नौ लाख 94 हजार रुपये खर्च किये गये हैं.
दस दिनों में ही टूट गयी ट्रॉली
कई मुहल्लों में जानेवाले हैंड ट्रॉली दस दिनों में ही टूट गयी. पार्षद बताते हैं कि इससे तो बेहतर पुरानेवाली हैंड ट्रॉली थी, जो काफी दिनों तक चली थी. नाम न छापने की शर्त पर विभाग के एक कर्मी ने बताता कि हैंड ट्रॉली काफी कमजोर है. विभाग इसकी खरीदारी कैसे कर लिया यह समझ से परे है. कई टूटी हुई ट्रॉली नगर पर्षद के ग्राउंड फ्लोर स्थित स्टोर रूप में पड़ी हैं.
लाखों रुपये खर्च कर खरीदे गये डस्टबीन आज हो रहे बेकार
क्या कहते हैं पार्षद और समाजसेवी
वार्ड प्रतिनिधि हैदर अली ने कहा कि हैंड ट्रॉली तो काफी कमजोर है. पांच से दस दिनों में ही टूट गयी. इतनी बड़ी राशि से ऐसे कमजोर ट्रॉली की खरीदारी आखिर कैसे हुई, यह जांच का विषय है.
धीरेंद्र कुमार चौधरी कहते हैं कि डस्टबीनों की खरीदारी में काफी लापरवाही बरती गयी है. इसकी जांच होनी चाहिए, ताकि सही तथ्य सामने आ सकें. शहर के वार्डों में, तो डस्टबीन दिखता ही नहीं है. कुछ जगहों पर बड़े डटस्बीनों को लगाया गया है.
वार्ड में रखने की जगह नहीं है,लोग गुसाते हैं
डस्टबीनों को वार्ड के अंदर रखने में परेशानी हो रही है. यह वार्ड के बाहर लगायी गयी है, जहां नहीं लगाया गया है, वहीं लगायी जायेगी. वार्ड के अंदर लोगों के दरवाजे पर रखने से उनकी नाराजगी हो जाती है.
इफ्तेखार अहमद , नप के उपाध्यक्ष
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