राशि के बाद भी नहीं बना रिमांड होम

Published at :23 Sep 2015 1:51 AM (IST)
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राशि के बाद भी नहीं बना रिमांड होम

संवाददाता : बक्सर बक्सर जिले में स्थापना काल के बाद से रिमांड होम बनाने की कवायद चल रही है. मगर अब तक जिला प्रशासन रिमांड होम नहीं बनवा सका है. इसके लिए जिले में चौसा प्रखंड के पवनी गांव में एक एकड़ से अधिक जमीन जिला प्रशासन ने चिह्नित भी किया है. बिहार सरकार के […]

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संवाददाता : बक्सर बक्सर जिले में स्थापना काल के बाद से रिमांड होम बनाने की कवायद चल रही है. मगर अब तक जिला प्रशासन रिमांड होम नहीं बनवा सका है.

इसके लिए जिले में चौसा प्रखंड के पवनी गांव में एक एकड़ से अधिक जमीन जिला प्रशासन ने चिह्नित भी किया है. बिहार सरकार के कल्याण विभाग ने निविदा भी निकाला और इसके निर्माण के लिए डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक की राशि भी दे दी है, मगर निर्माण नहीं हो सका. जिलाधिकारी ने राज्य सरकार को पवनी की जमीन के लिए अपने स्तर से अनापत्ति प्रमाणपत्र भी करीब एक साल पहले दे दिया,

बावजूद निर्माण कार्य नहीं हुआ. पवनी में जो जमीन रिमांड होम के लिए दी गयी है फिलहाल उस जमीन पर अतिक्रमण है और कई लोगों ने कब्जा कर रखा है, जिससे उस पर निर्माण कराना संभव नहीं है. जमीन पर से अतिक्रमण हटाना जिला प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है.

पिछले दिनों जिला जज की अध्यक्षता में अनुश्रवण समिति की बैठक हुई थी, जिसमें पवनी की जमीन पर हुए अतिक्रमण पर चर्चा की गयी थी और अनुश्रवण समिति ने उस जमीन से अतिक्रमण हटाने की पुरजोर मांग की थी.

बावजूद इसके आज तक उस जमीन पर से अतिक्रमण नहीं हटा. किशोरों के लिए अधिकतम सजा तीन वर्ष : किशोर न्याय परिषद में किशोरों के लिए अपराध की अधिकतम सजा तीन वर्ष के लिए ही हो सकती है. बावजूद इसके मामले लंबित रहने से किशोर अपराध के लिए किशोर कैदियों को इससे अधिक समय तक सुनवाई न होने से रिमांड होम में रहना पड़ता है. किशोर न्याय परिषद बोर्ड की धारा 13-7 के तहत छोटे-मोटे अपराधों के लिए थाना स्तर पर ही निबटाये जाने का प्रावधान है और किशोर न्याय परिषद में सिर्फ गंभीर मामले ले जाये जा सकते हैं.

मगर बक्सर जिले में किशोर अपराधी को सामान्य अपराधियों की तरह रखा जाता है और हिरासत में भी लिया जाता है. पुलिस वह हथकड़ी दोनों का उपयोग किशोरों के लिए किया जाना मानवाधिकार का हनन है. किशोर न्याय परिषद में सुरक्षा के लिए गार्ड की प्रतिनियुक्ति नहीं है, जबकि इसकी मांग प्रधान न्यायाधीश द्वारा कई बार एसपी से की जा चुकी है.

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