नालंदा में अवैध हथियारों की फैक्ट्री पर वार, लेकिन क्यों नहीं थम रहा अपराध?

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Nalanda News । AI Generated

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– बढ़ती आपराधिक घटनाओं ने खड़े किए कई सवाल – अपहरण, लूट, चोरी और अवैध हथियारों की घटनाओं में बढ़ोतरी से बढ़ी चिंता, – पुलिस की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता

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नालंदा के बिहारशरीफ से कंचन कुमार की रिपोर्ट
Nalanda News: कभी बेहतर कानून-व्यवस्था और सुशासन की पहचान रखने वाला नालंदा जिला एक बार फिर बढ़ते अपराध को लेकर सुर्खियों में है. पिछले तीन वर्षों में जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों से पांच मिनी गन फैक्ट्रियों का भंडाफोड़ हो चुका है. इसके बावजूद अवैध हथियारों का निर्माण, उनकी अंतर-जिला आपूर्ति और सार्वजनिक आयोजनों में हथियारों का खुलेआम प्रदर्शन लगातार सामने आ रहा है.

शादी समारोह, बारात, जुलूस और अन्य कार्यक्रमों में अवैध हथियारों से हर्ष फायरिंग तथा हथियार लहराने के वीडियो आए दिन सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिससे आम लोगों में सुरक्षा को लेकर भारी चिंता बढ़ी है. इधर, अपहरण, हत्या, चोरी, लूट, डकैती और मारपीट जैसी परंपरागत आपराधिक घटनाओं में भी बेतहाशा वृद्धि देखी जा रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि हालात धीरे-धीरे दो दशक पहले के उस खौफनाक दौर की याद दिलाने लगे हैं, जब नालंदा अपराध की घटनाओं के कारण देश भर में बदनाम था.

हथियार सप्लाई का मुंगेर कनेक्शन आया सामने

हालांकि, जिला पुलिस प्रशासन लगातार त्वरित कार्रवाई, अपराधियों की गिरफ्तारी और असामाजिक तत्वों के विरुद्ध विशेष अभियान चलाने का दावा कर रहा है, लेकिन लगातार हो रहे बड़े खुलासे यह साफ संकेत देते हैं कि अवैध हथियारों का यह नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका है. अपराध मामलों के जानकारों का मानना है कि केवल हथियार बरामद कर आरोपितों की गिरफ्तारी कर लेने से इस विकट समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है.

अवैध हथियार निर्माण की पूरी श्रृंखला को जमीनी स्तर पर ध्वस्त करने, कच्चे माल की उपलब्धता पर कड़ा नियंत्रण रखने, सप्लाई नेटवर्क को तोड़ने, फरार अपराधियों की नियमित निगरानी करने और पुलिस-जन संवाद को मजबूत बनाने की सख्त जरूरत है. पुलिस जांच के अनुसार, कई शातिर आरोपी मुंगेर में अवैध हथियार बनाना सीखने के बाद नालंदा में मिनी गन फैक्ट्रियां संचालित कर रहे थे, जहां तैयार हथियारों की आपूर्ति पटना, जहानाबाद, नवादा और आसपास के अन्य जिलों तक बड़े पैमाने पर की जाती थी.

पिछले तीन सालों में हुए पांच बड़े खुलासे की सूची

जिले में सक्रिय मिनी गन फैक्ट्रियों के खुलासे का विवरण केस-दर-केस इस प्रकार है:

केस-01 (परवलपुर): 27 जून को परवलपुर थाना क्षेत्र के मौआ और कटहरी बीघा गांव के बीच स्थित खंधा में पुलिस ने छापेमारी कर एक मिनी गन फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया. हिलसा-2 के डीएसपी ऋषिराज के नेतृत्व में हुई कार्रवाई में शिशुपाल मिस्त्री, उसके पुत्र पप्पू कुमार, सुधीर विश्वकर्मा और राजदेव यादव को गिरफ्तार किया गया. मौके से अर्द्धनिर्मित देसी कट्टा, बैरल, फायरिंग स्ट्राइकर सहित भारी मात्रा में उपकरण और एक मोटरसाइकिल बरामद की गई.

केस-02 (इस्लामपुर): 10 जनवरी 2026 को इस्लामपुर थाना क्षेत्र के आत्मा मठ गांव में नालंदा पुलिस और एसटीएफ (STF) की संयुक्त टीम ने एक झोपड़ी में संचालित मिनी गन फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया. इस कार्रवाई में संतोष विश्वकर्मा, जय वर्मा और महेंद्र प्रसाद को गिरफ्तार किया गया, जबकि मुख्य आरोपी विमल राम फरार हो गया.

केस-03 (सोहसराय): 26-27 जून 2025 की रात सोहसराय थाना क्षेत्र के आशानगर मोहल्ले में किराये के मकान में चल रही मिनी गन फैक्ट्री का पुलिस ने खुलासा किया. इस मामले में मुख्य कारीगर अभिषेक कुमार उर्फ अभिषेक विश्वकर्मा और उसकी पत्नी साक्षी को गिरफ्तार किया गया, जिसने मुंगेर में हथियार बनाने का प्रशिक्षण लिया था.

केस-04 (चिकसौरा): जून 2025 में चिकसौरा थाना क्षेत्र से पुराने शातिर शंकर विश्वकर्मा को उसके घर से गिरफ्तार किया गया, जो अपने भाई कृष्णा विश्वकर्मा के साथ मिलकर कई जिलों में अवैध हथियारों की सप्लाई करता था. इससे पहले 9 अक्टूबर 2023 को भी चिकसौरा के मिर्जापुर गांव में संचालित फैक्ट्री से पांच देसी कट्टे, 24 बैरल और ड्रिल मशीन के साथ शिशुपाल मिस्त्री को दबोचा गया था. इन मामलों से चिकसौरा अवैध हथियारों का हॉटस्पॉट बन चुका है.

केस-05 (करायपरसुराय): दिसंबर 2024 में करायपरसुराय थाना क्षेत्र में पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर कृष्णा बिन्द के घर छापेमारी की और उसे हथियार बनाते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था, जिससे ग्रामीण इलाकों में फैले नेटवर्क की पुष्टि हुई.

पारदर्शिता-कार्यप्रणाली पर उठने लगे सवाल

लगातार हो रहे इन खुलासों के बीच जिला पुलिस की कार्यप्रणाली भी गंभीर चर्चा का विषय बनी हुई है. करीब एक दशक पहले तक जिले के सभी थानों में दर्ज आपराधिक मामलों, फरार अपराधियों की सूची, कुल गिरफ्तारी, लंबित मामलों और पुलिस की उपलब्धियों का विस्तृत विवरण सार्वजनिक नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित किया जाता था. इसके साथ ही प्रत्येक माह जिला स्तर पर पुलिस कप्तान (एसपी) की विस्तृत प्रेस वार्ता आयोजित होती थी, जिसमें पत्रकार खुलकर तीखे सवाल पूछते थे और अधिकारियों को जवाब देना पड़ता था.

वर्तमान व्यवस्था में अधिकांश मामलों की जानकारी केवल एकतरफा प्रेस नोट और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से दी जाती है. नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस और खुली प्रश्नोत्तर व्यवस्था लगभग समाप्त हो गई है, जिससे अनुसंधान की प्रगति पर विस्तृत सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाती. इससे पुलिस की पारदर्शिता और जनविश्वास को लेकर समय-समय पर सवाल उठ रहे हैं.

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Kanchan Kumar

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