नालंदा में पैकेटबंद भोजन खरीदने का बढ़ा चलन, किसानों की रसोई में भी नहीं मिलती खुद से तैयार की सामग्री

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नालंदा जिले में खेत में लगी धान की फसल.

नालंदा की रसोई की तस्वीर बदल रही है. जहां पहले किसान अपनी उपज से घर की ज़रूरतें पूरी करते थे, वहीं अब वे बाज़ार से पैकेटबंद चावल, आटा, दाल और मसाले खरीद रहे हैं. जानें इस बदलाव के पीछे की वजहें और इसके स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव.

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कभी नालंदा के गांवों में खेत की उपज ही घर की रसोई की रीढ़ हुआ करती थी. धान से चावल, गेहूं से आटा, तेलहन से तेल, चना-मसूर से दाल और धनिया, मिर्च व हल्दी जैसी मसाला फसलों से घर में मसाले तैयार होते थे. अब तस्वीर बदल रही है. किसान धान-गेहूं, दलहन-तेलहन की फसल तैयार कर खेत से ही व्यापारियों के हाथों बेच रहे हैं, जबकि अपनी जरूरत का चावल, आटा, दाल, तेल, मसाला और घी बाजार से पैकेट में खरीदकर घर ला रहे हैं.

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किसानों ने कहा-फसल बेच कर खरीदते खाद्य सामग्री

बेन प्रखंड के बभनियावां निवासी अर्जुन प्रसाद बताते हैं कि किसान अब उपज बेचकर घरेलू जरूरत की खाद्य सामग्री बाजार से खरीद रहे हैं. दूध बेचने वाले कई पशुपालक जरूरत पड़ने पर बाजार से ब्रांडेड कंपनियों का डिब्बाबंद घी खरीदते हैं. कभी धान से चावल तैयार करना, गेहूं साफ कराकर पिसवाना और तेलहन से तेल निकलवाना गांवों में सामान्य प्रक्रिया थी. अब इन कामों की जगह बाजार से तैयार सामग्री खरीदने का चलन बढ़ गया है.

रसाई घर में पैकेटबंद सामान ने बनायी जगह

मधु कुमारी कहती हैं कि अनाज धोने, सुखाने, साफ करने और पिसवाने की मेहनत जरूर कम हुई है, लेकिन इसके साथ घरेलू खाद्य प्रसंस्करण की परंपरा भी कमजोर हुई है. चावल, आटा, दाल, खाद्य तेल और मसाले अब सीधे पैकेट में घर पहुंच रहे हैं. सुविधा बढ़ी है, लेकिन इसका असर गांव की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है. किसान की उपज गांव में ही प्रसंस्करण और खपत की पूरी श्रृंखला बनाने के बजाय व्यापारी, प्रसंस्करण इकाइयों और पैकेजिंग कंपनियों के जरिये बड़े बाजार तक पहुंच रही है.

2004-06 के बाद बदली खरीदारी की आदत

नालंदा में वर्ष 2004 से 2006 के बीच मॉल और आधुनिक खुदरा बाजारों के विस्तार के साथ पैकेटबंद खाद्य सामग्री का बाजार तेजी से बढ़ा. आकर्षक पैकिंग, विभिन्न आकार के पैकेट, ऑफर, ब्रांड और एक ही जगह पर कई तरह की खाद्य सामग्री की उपलब्धता ने लोगों को आकर्षित किया. धीरे-धीरे यह सुविधा गांवों की दुकानों तक पहुंची और पारंपरिक घरेलू खाद्य प्रसंस्करण की श्रृंखला कमजोर होती चली गयी.

धान-गेहूं खेत में, चावल-आटा बाजार में: नालंदा की बदलती रसोई | Prabhat Khabar Network
खेत में लगी धान की फसल.

जिले में 51.01 लाख क्विंटल फसल का उत्पादन

आंकड़ों के अनुसार जिले में धान, गेहूं, चना, मसूर, सरसों और मक्का का कुल उत्पादन करीब 51.01 लाख क्विंटल है. 2026-27 के एमएसपी को आधार मानने पर इन छह फसलों के उत्पादन का अनुमानित मूल्य करीब 1,391.33 करोड़ रुपये बैठता है. इसमें धान 666.39 करोड़, गेहूं 531.90 करोड़, चना 47 करोड़, मसूर 119 करोड़, सरसों 18.60 करोड़ और मक्का 8.44 करोड़ रुपये शामिल हैं.

1,770 करोड़ रुपये का पैकेटबंद खाद्य बाजार

उपलब्ध जनसंख्या, उपभोग व्यय और बाजार वृद्धि दर के आधार पर तैयार मॉडल के अनुसार 2025 में नालंदा में खाद्य एवं पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की सालाना खरीदारी करीब 1,770 करोड़ रुपये हो सकती है. यानी औसतन 147.5 करोड़ रुपये प्रतिमाह और करीब 4.85 करोड़ रुपये प्रतिदिन की खरीदारी का अनुमान है. हालांकि यह जिले के कारोबार का सरकारी प्रकाशित आंकड़ा नहीं, बल्कि विभिन्न मानकों पर आधारित अनुमान है.

धान-गेहूं खेत में, चावल-आटा बाजार में: नालंदा की बदलती रसोई | Prabhat Khabar Network
पैकेटबंद चावल.


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